muktak by ramesh raj

|| “ गीतिका ” छंद में मुक्तक ||
वो मुझे निश्चिन्त हर मुद्दे पे ऐसे कर गये
आँख में आंसू , ह्रदय में प्यार से डर भर गये,
तेग या तलवार ने क्रन्दन किसी का कब सुना
चाकुओं के कान तक कब याचना के स्वर गये ?

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