muktak by vinod gorakhpuri ‘ nirbhay ‘

जब भी वो बालों को सुलझाती हैं|
हवा तेज होकर के उलझाती है||
हैं तकदीरवाली हवायें ‘विनोद’,
ये साँसों से रग-रग में घुल जाती हैं|

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