#Muktak by Dheeraj Kumar Pachwaria

ज़माने   के   इरादों   को    पढ़    तो    रहा    हूँ

धीरे   धीरे   बुलंदियों   पर   चढ़   तो   रहा   हूँ

हश्र  मेरी  ज़िन्दगी  का  मुझे  ख़ुद  पता  नहीं,

आंख से आंख मिला अपनों से लड़ तो रहा हूँ

 

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