#Muktak by Dherendra Panchal

फुलझड़ियों के पैसे तुम भी कर दो दान दिवाली में ।।
ख़ुद के हाथों बिक ना जाए स्वाभिमान दिवाली में ।।
बच्चों के इस भूखे तन को किस मज़हब का चादर दूँ।।
सड़क किनारे सिसक रहे थे कूड़ेदान दिवाली में ।।

मिष्ठानों का वितरण कर तुम पा गए मान दिवाली में ।।
भूखे कंधे आकर मिलते हैं शमशान दिवाली में ।।
छप्पन इंची वाले सिने पर कैसे अभिमान करूँ ।।
बिलख रहे थे देख के हालत कूड़ेदान दिवाली में ।।
धीरेन्द्र पांचाल ……..

2 thoughts on “#Muktak by Dherendra Panchal

  • November 5, 2018 at 5:42 am
    Permalink

    वाह बहुत ही शानदार पँक्तियाँ

  • November 5, 2018 at 3:43 pm
    Permalink

    काव्यसागर पाठकों को दिवाली की शुभकामनाएँ

Leave a Reply

Your email address will not be published.