#Muktak By Dinesh Pratap Singh Chauhan

“दोहे”

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हार जीत की जंग में ,…. . जीत कभी या हार।
उसकी कभी न हार हो ,जिसका मक़सद प्यार।।
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नज़रें करतीं याचना,दिल करता स्वीकार।
इन दोनों का मेल ही ,कहलाता है प्यार।।
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जगत विरोधी होत है,…. . हाल होंय बेहाल।
सोच समझ ले खूब तू,कठिन प्रेम की चाल।।
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धूल कणों को गिन सकें,कौन गिनेगा प्रीत।
जो भूले से नाम ले ,.. लेता हरि को जीत।।
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दादी बाबा अब कहाँ?कहाँ मिले वो प्यार।
पति पत्नी बच्चे हुये,परिभाषा परिवार।।
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दो के दूने चार हों ,…. नहीं हुआ हर बार।
सदा नहीं मिलता कभी,प्यार और सत्कार।।
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नैनों ने मनुहार की ,. दिल करता स्वीकार।
मन का मिलता साथ तो ,हो जाता है प्यार।।
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लालच लोभी को ठगे ,ठगे मूर्ख को चाह।
जो ठग जाये प्रेम में,उसको कहिये वाह।।
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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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