#Muktak by Dinesh Pratap Singh Chauhan

“दोहे(आँसू)”
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आँसू तब बहते यहाँ ,जब भी पिघले दर्द।
लेकिन आँसू थाम लें ,वो कहलाते मर्द।।
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आँसू नहीं बहाइये ,काँधा मिले न कोय।
हँसी उड़ायेंगे सभी ,. साथ न कोई रोय।।
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पत्थर या इन्सान की ,आँसू ही पहचान।
आँखों में आँसू नहीं ,. वो कैसा इन्सान ।।
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रुके रहें जो आँख में ,. तब तक तो बेमोल।
गिर जायें जो आँख से ,नहीं रहे फिर मोल।।
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केवल अपने लिये तो ,जीता सकल जहान।
आँसू पोंछे दुखी के ,. वो सच्चा इन्सान।।
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बेईमानी जो करे ,मौज करे इन्सान।
आँसू ही पीते यहाँ ,धर्म और ईमान।।
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वोट डालते समय तो,वोटर मालिक होय।
और वोट जब दे चुके,आँसुन से वो रोय।।
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आँसू सूखें आँख में,…. कर्ज गिराता मान।
नहीं किसानों के लिये,होता क्या भगवान।।
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किसान की तक़दीर में ,पीर व आँसू खूब।
सत्ता वालो शर्म से ,फिर तो मरिये डूब।।
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डालर सर पे चढ़ गया ,ठोकर रहा लगाय।
बेचारा रुपया दुखी ,… आँसू रहा बहाय।।
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“दिनेश प्रताप सिंह चौहान”

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