#Muktak by Dr Krishan Kumar Tiwari

मुक्तक
दुर्भाग्य अपने देश का उनचास रहा है ,
मुट्ठी में जगलरों की आकाश रहा है ,
जो गरजते रहे वह बरसे नहीं कभी —
इन बादलों का ऐसा इतिहास रहा है !

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औरत में यही चीज यही चीज मर्द में ,
खोई हुई है दुनिया अपने ही दर्द में ,
परवाह नहीं करता अब कोई किसी का—
आदम की आदमीयत मिल गई गर्द में!
—— डॉ. कृष्ण कुमार तिवारी नीरव

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