#Muktak by Dr. Krishan Kumar Tiwari Neerav

संघर्षों में बीत गया दिन सिर्फ निशा है बची हुई,

अब तो केवल ऊपर की ही एक दिशा है बची हुई,

सारा तन निष्प्राण हो गया भौतिक अंतर्द्वंदों में—

पता नहीं है फिर भी कैसे जिजीविषा है बची हुई ।

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कुछ ख्वाब बचे होते कुछ नींद बची होती,

आंखों से लगाने को कुछ ईद बची होती,

घर छोड़के जीवन भर फुटपाथ पे रह लेता—

गर तुमसे मोहब्बत की उम्मींद बची होती।

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दिल में अकूत ममता उद्भूत करे राखी,

भीतर से मोहब्बत को आहूत करे राखी,

यह देख पड़े नीरव बहनों की सुरक्षा में—-

भाई की कलाई को मजबूत करे राखी !

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वह लड़खड़ा रहा है दरारों पे चल रहा,

क्यों रिस्क लेके इतना करारों पे चल रहा,

थोड़ा भी चूक जाए तो गिर जाए गर्त में—

मैं देखता हूं व्यक्ति किनारों पे चल रहा ।

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