#Muktak By Dr. Krishan Kumar Tiwari Neerav

 

किस्मत की डोर हाथ से खुद छूटती गई ,

उम्मीद अपने आप ही सब टूटती गई ,

मजबूत बहुत जान के जिस जिस को भी पकड़ा—

दुर्भाग्य से हर डाल ही वह टूटती गई।

 

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वृक्ष से बीज है वृक्ष है बीज से ,

दुख गुजरता है सबकी ही दहलीज से ,

मौत आने पे है कोई बचता नहीं–

लोग हारे हैं तो बस इसी चीज से।

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बिना चोट के कभी नहीं सी निकलेगा ,

कॉलर पकड़े बिना नहीं जी निकलेगा ,

मैंने लोगों का स्वभाव पहचान लिया—-

उंगली टेढ़ी करो तभी घी निकलेगा।

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चुपके चुपके प्रेम जताया दिल को दिल से जोड़ दिया ,

जब कुछ अच्छा दिन आया तो दिल का रिश्ता तोड़ दिया ,

बड़े स्वार्थी हो तुम इसका दंड तुम्हें ईश्वर देगा —

मामूली तकलीफ नहीं है तुमने मुझको छोड़ दिया !

 

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