#Muktak by Dr. Krishan Kumar Tiwari Neerav

मुक्तक

गगन का चांद तुम जैसा कभी निखरा नहीं देखा ,

किसी पर हुस्न का ऐसा कभी पहरा नहीं देखा ,

जो दिल में है वही लब पर दिखाई पड़ रहा मुझको—

इतना साफ मैंने आज तक चेहरा नहीं देखा

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मामलों में उल्फत के सवालात मत करना,

भूल कर किसी से भी दिल की बात मत करना,

शाम तक चले आना अपने आशियाने में—

गैर की पनाहों में कभी रात मत करना ।

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मारकर चमड़ा उतारा जा रहा, देह से कपड़ा उतारा जा रहा ,

अब कहीं कच्चा नहीं रह जाएगा– घरों से खपड़ा उतारा जा रहा।

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प्यार मौजूद होता अगर शब्द में, दिल ही रख देता पेश-ए-नज़र शब्द में,

दिल की हर धड़कनें व्यक्त करता तुम्हें —

इतनी सामर्थ्य होती अगर शब्द में।

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कर्म बेचा जा रहा है धर्म बेचा जा रहा ,

ब्रह्म की आराधना का मर्म बेचा जा रहा ,

उम्र भर के दुराचारी बनें हैं  धर्मात्मा —

दामड़ों पर आदमी का चर्म बेचा जा रहा ।

—–डॉ. कृष्ण कुमार तिवारी नीरव

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