Muktak by Dr Krishan Kumar Tiwari, Neerav

जिंदगी भर झेलता हूं क्या ये जिल्लत कुछ नहीं,

किस नजर से आँकते हो मेरी कुब्बत कुछ नहीं,

खींचकर मारूंगा फिर से बोल कर तो देख लो —-

तेरी हिम्मत कुछ नहीं या मेरी इज्जत कुछ नहीं ।

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घर के अंदर कीड़ों जैसे भरे हुए हैं लोग ,

जान बचाने की नौबत है डरे हुए हैं लोग ,

चाहे जितना जुल्म करो ये बोल नहीं सकते —

ऐसा लगता है सब जैसे मरे हुए हैं लोग!

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आदर्श राजनीति का उतरा है शहर में,

माहौल दहशतों का बिखरा है शहर में,

अब कोई सवारी हो अंदर नहीं जाती—

कर्फ्यू लगा हुआ है खतरा है शहर में ।

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कुछ गर्म हो गई है हवा मेरे गांव की,

लू में बदल गई है हवा मेरे गांव की,

मैं देखता हूं रोज ही झुलसा रही सबको —-

बेशर्म हो गई है हवा मेरे गांव की।

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