#Muktak by Dr Prakahr Dixit

सच को सच कहने का साहस कितने लोग किया करते हे।
सब्र और संयम का अमृत कितने लोग पिया करते हैं।।
यूँ भलमन्साहत का दावा करते प्रखर बहुत से गुम्बद,
लेकिन कभी झांककर देखो वह दीन को दु:ख दिया करते हैं।।
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जो भी जितना दिया ईश ने सब्र उसी में अच्छा होता।।
क्या लाए क्या जाए साथ में जग चिड़िया रैन बसेरा होता।
शाश्वत कुछ भी नहीं जगत में व्यापक ब्रह्म चराचर में,
वेद रीत गहि ईश्वर सुमिरन मग देखो प्रखर उजेरा होता।।

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रे मन दग्ध दुखी क्यों इतना जब जागो तभी सवेरा होता।
अघ कर्मों को छोड़ मनस तू पाप का तमस घनेरा होता।।
संत वचन सत्कर्म मोक्ष मग प्रखर भजै अविनाशी मन,
सी लेता मैं अपना जीवन गर उसने न दर्द उकेरा होता ।।

डॉ प्रखर दीक्षित
फर्रूखाबाद

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