#Muktak by Dr Prakhar Dixit

विप्र शिरोमणि भगवान परशुराम जी के जन्मदिन पर सादर प्रणाम

 

मुक्तक

 

 

सांझ

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अवसान दिवस अब क्लांत मनस राकेश आगमन अस्ताचल में।

खग कोलाहल तरु साखों पर उन्मुख घर ओर री! हलचल में।।

नन्हाँ दीपक तम से लडनें प्रदीप्त हुआ निर्भय होकर,

लड गया आंधियों से दीपक पर्यंत रात्रि की खलबल में।।

 

प्रखर दीक्षित

 

 

आक्रोशित मन के उद्गार….

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(1)

गरूर दीवान के पन्ने को  ठहरो फाड़ देंगे हम।

गंदले आब साहिल से नाता तोड़ लेंगे हम।

जिस दिन उठ गयी उंगली सर्जना के दामन पर,

उठाऐंगे नहीं लेखनि सृजन का व्रत  छोड़ देंगे हम।।

 

(2)

 

कंगूँरों से शिकायत है दख़ल क्यों बुनियाद पर रखते।

ग़ज़ल को कर रहे आहत भटकते  मतला औ’ मखते।।

हुए रुखसत काफिया देखो ग़ज़ल फिर गुनगुनाएगी;

जिन्हें हद पार की आदत स्वाद जिल्लत मियाँ चखते।।

 

प्रखर दीक्षित

फर्रुखाबाद(उ.प्र.)

[7:35 PM, 4/14/2018] Dr Prakhar Dixit:

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