#Muktak by Dr Prakhar Dixit

पद

प्रखर! जा जग में बहु संघात।

दोऊ हाथन लूटैं चुरवा बिछ गयी दुसह बिसात।

का मिलिहै परदुख दै कै हा!  जो बोवैं सोई पात।।

वृथा गुमान जा नश्वर देही खग बिना कहे उड़ जात।

रीति नीति अनुशासन बिसरे अब आंसूँ ढरकात।।

जानो एक दिन सबै संगाती फिर काहे रंग सुहात।

प्रखर कोऊ दर जावौ लेकिन बिगरी प्रभू बनात।।

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(कन्नौजी रसरंग)

 

पद

सखे! तुम बोलौ बोल सँभार।

जहि बानी मँह बसै अमिय रस नहिं घोरौ गरल विचार।।

काह लाए का लै कैं जैहौ अंत माँ दींहें देह पजार।

बड़ो कठिन पनघट पथ भैया जीवन द्वै दिन को व्योपार।।

एक आसरो आशा प्रभु सों  बहि करिहैं भव सों पार।

प्रखर दई प्रभु संतति संपति ताको मानौ शुक्र अपार।।

✍ प्रखर दीक्षित

फर्रुखाबाद

 

 

 

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