#Muktak by Dr Prakhar Dixit

(कन्नौजी रसरंग)

मुक्तक

 

घन केश विमुक्त अलक उरझी कर पहुँची नैना रतनारे।

अधराधर रक्तिम विधु आनन मकराकृति कुंडल मतवारे।।

विरही अंगना पिय राह तकै हिय आकुल गेह लगे सूनो,

करि वदा गये हद पै पिय जू मग हैरत हे री! सखी हारे।।

 

प्रखर फर्रूखाबाद

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