#Muktak by Gayaprasad Mourya Rajat

 

चलो सच कह ही देता हूँ .

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आसमान के सूरज को धरती का दीप दिखाना चाहता हूँ ,

टुकड़े -टुकड़े बटी हुई है   जग में  प्रीति जगाना चाहता हूँ .

मेरे दोषों को मत देखो    मैं तो एक बुलबुला पानी का हूँ ,

मैं दम्भी सागर को एक  बूँद का मान बताना चाहता हूँ .

रजत – आगरा

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