Muktak by Harsh Jain Saharsh

जिंदगी भर जिंदगी से लड़ रहा है आदमी

जिंदगी अज़ब तरीके से पढ़ रहा है आदमी

नज़र कहीं कदम कहीं मंजिल कहीं क्या पता

कौन जाने किस रास्ते पर बढ़ रहा है आदमी

हर्ष जैन सहर्ष

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