#Muktak by Jasveer Singh Haldhar

दोहे -विविध

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1

घर के और मकान के ,अलग अलग उपमान ।

घर माँ का दरबार है ,बजरी ईंट मकान ।।

2

भोग रहे हैं कष्ट वो ,बटवारे से त्रस्त ।

जो भारत आके बसे ,अच्छे खासे मस्त ।।

3

किसने कितनी पी यहाँ ,इसका नहीं सवाल ।

महफ़िल किसके नाम है ,करता कौन बबाल ।।

4

साठ साल तक ढो लिया ,सरकारी अधिपत्य ।

निवृत्ति के उपरांत ही ,रच पाये साहित्य ।।

5

तरह तरह की बहस में ,किया समय बर्बाद ।

पत्ता जिस बिन ना हिले ,उसे किया ना याद ।।

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