#Muktak by Kavi Nilesh

जरिया ढूंढ लूं मैं भी बड़ी मुश्किल हालातों में

सब्जी तीखा हो फिर भी मैं चटकारे लूं सलादों में

घनघोर हैं बादल  , पर तुमसे मिलना जरुरी है

बना डाला हूं रेनकोट तब, प्लास्टिक के ही थैलों में

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मरा हूं जवाने से, तुम मार दिए तो क्या हुआ?
हारा हूं बहुत दिन मैं, तू हरा दिए तो क्या हुआ?
छिपकर हम गलियों में जाते फिर भी तुमने थूके है
थूके हैं हजार लोग, तुम थूक दिए तो क्या हुआ?
कवि निलेश

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