#Muktak by Madan Mohan Sharma Sajal

‘सजल’ के मुक्तक
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आधार छंद – विधाता
मापनी – 1222 1222 1222 1222
समान्त – अना
पदान्त – पन
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जरा तुम गौर से देखो, सियासत का कमीना पन,
यहां सब और नफरत है, नही दिखता है’ अपना पन,
‘सजल’ हर रोज बिकता है, गरीबों का सफरनामा,
बरसते हर तरफ कांटे, नहीं बरसा सयाना पन।
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समान्त – आले
पदान्त – है
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किसी की आंख में आंसू, किसी के दिल में’ छाले हैं,
सभी सपने छलावा है, गहन दुख के निवाले है,
बरसती आग के शोले, दिलों में नफरती सूरत,
कहीं रिश्तों में टूटन है, कहीं पर जहर प्याले हैं।
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समान्त – आरा
पदान्त – है
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सहारा है नहीं कोई, न हीं कोई किनारा है,
भरी दुनियां भरी महफिल, न कोई भी हमारा है,
सफर कटता नहीं अब तो, अकेले दिल तड़पता है,
‘सजल’ मिलकर सफर काटें, यही दिल को गवारा है।

मदन मोहन शर्मा ‘सजल’
कोटा, (राज0)

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