#Muktak by Mithilesh Rai Mahadev

जिन्दगी मिलती नहीं किसी को सस्ती बनकर!
कोई तन्हा है कहीं कोई हस्ती बनकर!
नेकियाँ करते चलो तुम भी कुछ जमाने में,
जिन्दगी जी लो तुम राहों में मस्ती बनकर!

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अपनी तमन्नाओं पर मैं नकाब रखता हूँ!
धड़कनों में यादों की मैं किताब रखता हूँ!
हर घड़ी तड़पाती है मुझे तेरी गुफ्तगूं,
दर्द तन्हा रातों की बेहिसाब रखता हूँ!

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कोई खौफ़ नहीं है मरने से मुझको!
दामन में अश्कों के बिखरने से मुझको!
क्या रोकेगी तन्हाई शामों-सहर की,
जिन्दगी भर इंतजार करने से मुझको!

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तेरा जिक्र दर्द का बहाना बन जाता है!
मेरी बेखुदी का अफसाना बन जाता है!
जब भी याद आती है मुझे तेरी दिल्लगी,
जख्मों का दिल में आशियाना बन जाता है!

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तेरा जो दीवाना था कब का मर गया है!
तेरा जो परवाना था कब का डर गया है!
कायम था तूफान जो मेरे अरमानों का,
तेरी बेवफाई से कब का मुकर गया है!

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तुमसे बार बार मैं बात करना चाहता हूँ!
तेरी जुल्फ के तले रात करना चाहता हूँ!
आती हैं हवाएं लेकर जब तेरी ख़ुशबू,
फिर से एक बार मुलाकात करना चाहता हूँ!

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