#Muktak by Mithilesh Rai Mahadev

मेरा हरेक आलम ख्वाब तेरा लगता है!

तेरा ख्याल सर्दियों में धूप सा जलता है!

जब भी सताती हैं सरगोशियाँ इरादों की,

नींद के आगोश में दर्द तेरा चलता है!

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कभी न कभी हम सबको रोना ही पड़ता है!

कभी न कभी गमज़दा होना ही पड़ता है!

हमराह जिन्दगी में कई मिलते हैं लेकिन,

कभी न कभी उन सबको खोना ही पड़ता है!

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कभी तो किसी शाम को घर चले आओ!

कभी तो दर्द से बेखबर चले आओ!

रात गुजरती है मयखाने में तेरी,

राहे-बेखुदी से मुड़कर चले आओ!

 

 

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