#Muktak by Mithilesh Rai Mahadev

क्यों तुम भटक गये हो वस्ल की राहों में?

क्यों तुम बिखर गये हो दर्द की आहों में?

ढूँढती हैं मंजिलें रफ्तार हिम्मत की,

क्यों तुम नजरबंद हो खौफ की बाँहों में?

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आप जबसे जिन्दगी में मिल गये हैं!
रास्ते मंजिल के फिर से खिल गये हैं!
जागे हैं ख्वाबों के पल निगाहों में,
जख्म भी जिगर के जैसे सिल गये हैं!

 

 

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