#Muktak by Prakhar Dixit

दशहरा दोहे

अधम कर्म का हो बुरा, अहम वृत्ति गत नीच।
स्वर्णमयी लंका जली,जँह बसे निशाचर बीच।।

अंहकार का नाश खलु, किंचित हो बलवान।
न मानो तो लंक संग, रावण प्रखर प्रमान।।

ज्ञान भला बल भी भला, भला न दम्भी पाप।
हंडिया भर कुनबा मिटा , चलों सत्य मग आप ।।

बैर किया परब्रह्म से , दिन दिन दिन जोड़ा पाप।
परिजन पुरजन सब मिटे, अंतकाल संताप ।।

कुदृष्टि नारि पर मेटती, यह पापों का साध्य ।
ज्ञान विवेक सुबुद्धि ही, न होने दे बाध्य।।

लंक जली योद्धा मिटे, मिटा दशानन मीत।
चाहे जितना हो सबल, गिरे पाप की भीत।।

रावण अन्तर मारिए रखें राम हिय बास।
चले सांस जब तक प्रखर, तब तक राम से आस।।

प्रखर दीक्षित
फर्रुखाबाद(उ.प्र.)

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