# Muktak by Vijay Narayan Agrwal

मुक्तक:–

आखिर कहॉ औ कब तक ये बात चलेगी

बूढ़ों के सिर की पगड़ी बिलखात रहेगी,

झूमते बेखौफ़ मंजर ये”भ्रमर”से कह रहे,

कि अगले समय की पीढ़ी बेजात मिलेगी।

 

जागरण की ज्योति सहारा देती है

दिल  घबराये  तो   दुलारा  देती है,

पूँछ  लो  जगत  के  भाव  वृंद  से,

फँसी हुयी नइया को किनारा देती है

 

पाप तो सदा पुण्य के करीब होता है,

देखने  में  सुन्दर औ  अजीब होता है,

औचित्य भ्रमर वासना के इर्द गिर्द पर

उसमें भी अलग सबका नसीब होता है।।

 

सूर्य चमक दे खो गया करुणा करती शोर

पथ चलना दूभर हुआ,बिलख रहा है ठौर

कली कुसुम औ पुष्प में टूट रहा विश्वास  सरदी ने ढाया सितम धुन्ध बढी़ चहु ओर

 

भ्रमर   +919453510399

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