#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

-:मुक्तक:–

जिन्दगी उलफ़त की मारी, इस तरह कुछ कह रही है,

बिन  कवायद  वासना की, राह में वह घुट रही है ,

प्रेयसी है वो किसी की ये “भ्रमर “भी जानता,

बस  रही  है जान जिसमें, वह नदी सी बह रही है।।

 

दिल का दर्द अपने फ़नके मुस्तहक़ रखना

हो सके तो   हर हाल में उसे सहज रखना

चाहतों   का  दौर  तुझे   जीने   नही  देगा

धावक की तरह कौशल में चमक रखना।।

 

पावक की तरह खुद को ,ना ढलने देना,

उठती   हुयी  सुगंध को ,ना  ढकने देना,

उसके  सिवा और कोइ , हो नही सकता,

मिले आहट तो अश्रु  को, ना रुकने देना।

छटपटाहट से ध्यान को, ना बंटने देना।।

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