#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

राम नाम वह बृछ है,जो फल देत हजार ।

तोडे़ से वह फलत अरु,चहु दिश झुकती डार ।।

–:मुक्तक:–

बिद्वेश  भरी मदिरा ,सपने में अगर है,

मेरी समझ में केवल, वो मीठा जहर है,

आई जो बात लब पे,वो मैनै कह दिया,

क्या  सोचते हो  तुम,ये तेरा जिगर है।।

2

जब मैं निकला मोह दृष्टि से, अद्भुत चित्रण पाया है,

जंह तंह देखा दुनिया भर में कुंठा घेरे माया है,

कोई मुक्ति दिलाने वाली, “भ्रमर” राह दिखलाये ना,

सत्य तो मारा मारा फिरता,झूठा बिषय बिषाया है।।

3

बिन  पैसे  के   बेच   रहा  हूं, हरि द्वार  के मोती,

अभिलाषित कल्यान कल्पना ,खोती जीवन जोती,

साधु -असाधु -पिपासु- प्रतिष्ठा,जो चाहे सो ले ले,

गुणा भाग से रह जायेगी, गरिमा अश्रु भिगोती ।।

विजय नारायण अग्रवाल  “भ्रमर” रायबरेली उ० प्र०

मो ० +919453510399

 

 

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