#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

–:दोहा मुक्तक:–1

देश काल की लब्धता,ध्रुपद मुकुल सन्ताप,

ऐसे में सौभाग्य से,जनक विमोहित जाप,

चले खुशी का हल लिये,”भ्रमर”विभव के साथ,

धरनि धरा का रूप धर,फल से हुआ मिलाप ।।

2

निश्चित शुभ दिन आयगा,अरु जागेगा शेर,

महादेव की दृष्टि से, भागेगा अन्धेर,

भ्रमर सजल अनुभूति का,सदैव रखना ध्यान,

पूर्ब जनम के पाप तो,कटते देर सबेर।।

3

तृष्ना और स्नेह को,कौन सका है जान,

जगत विमोहित नारि ही,सृष्टी का वरदान,

“भ्रमर”सगुण संकल्प लेआया इस संसार

जैसी करनी होयगी, वैसा होगा पान ।।

–:मुक्तक:–1

मन ने  चाहा  सब कुछ पालूँ,

तन को हितकर भवन बनालूँ ,

इठलाये जो  धन  की सुषमा,

नमन सुधा से”भ्रमर”सजालूँ ।।

2

जड़वत तृष्णा की बरियाई,

उपमा के घर कनक ढिठाई,

आस”भ्रमर”की सबने लूटी,

तन मन धन बहरे ब्यवसाई।।

3

जो कर्म दुशः दुख देते हैं,

वे अरमानों के बेटे हैं,

लेकिन मेरी टूटी नइया,

सानन्द प्रभुजी खेते हैं।।

 

रचयिता प्रेषक:–“भ्रमर” रायबरेलवी

Ⓜ+91945351039

 

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