#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

दोहा:–1

जीवन सुधा संवारिये, शील भक्ति के संग।

करुणा व्याकुल हो रही,यौवन कटी पतंग।।

2

सुबिधा भरी बजार में, जो चाहे सो लेव।

अंग अंगरखा प्रेम रस,राम कृष्ण से देव।।

 

सोरठा:–1

यौवन बना कुरूप,बिषय भोग का द्वार रच।

भावों के अनुरूप,सम्हल रहा न प्रेम धन।।

2

ब्यथा विवेक सुधार,सब गुनिजन के पास है।

हर पल करो संवार,सन्त सुधा सुविचार से ।।

 

भ्रमर’ रायबरेलवी

Leave a Reply

Your email address will not be published.