#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

दोहा:-

चलकर देखाअक्सर हि,मैंने अपनी चाल।

तक्दीर वक्त के आगे,करती रही सवाल।।

सोरठा:–

अपने जिनके पास,वो अपनों से भिड़त हैं।

वो  मन  रहें उदास,जिनके अपने हैं नहीं।।

 

कुन्डली:–

सुख समृद्धि से सौम्यता,करत  शाश्वत गान।

शान्ति – नेह – माधुर्य को, दिल  में दो स्थान।।

दिल   में  दो  स्थान,  कामना   पूूरन   होई,

औषधि  बढी़ महान, अकुलता मन की खोई  ,

कहत’भ्रमर’कविराय,भरम क्यूँ जोड़त पौरुख,

क्या ढपली बजाने ,से युँ  मिल जायेगा सुख।।

 

:        ‘भ्रमर’ रायबरेलवी

 

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