#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

दोहे:–1

 

दम्भ दंश हठ छोड़ कर,जो रचताआधार।

संयम  ऐसे  जीव  का ,कर  देता  उद्धार।।

2

समय पूँछता जब यहॉ,सुष्मित धन है कौन।

ताकत -पैसा -जिन्दगी,सब  हो  जाते मौन।।

3

दैहिक भौतिक सम्पदा,नीति अनीति प्रसंग।

एेक से  बढ़कर एेक  हैं ,राजनीति  के अंग।।

 

सोरठा:–

विनय प्रीति व्यवहार,सब प्रतिभा के हैं धनी।

कर   देगें  उपकार, यदि  मन  से  चाहें  उन्हें।।

 

भ्रमर’ रायबरेलवी

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.