#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

मुक्तक:–1

 

गॉव की बृद्धा से पूँछो,वो तुम्हें समझायगी,

धीर यदि गम्भीर है तो ,बीरता मुस्कायगी,

वो भ्रमर जालिम जगत में,जो सुखों के साथ हैं

जीवनी की गुण व्यवस्था, दीपिका दरसायगी।।

2

वासना की सृष्टि से, कोई  मिलता फल नहीं,

हिय बिठाले परम धन को,ढूँढ न उसको कहीं,

जन्म के बन्धन”भ्रमर”तू क्या करेगा पास रख,

देव सरि है धाम तन का,अन्त भी तेरा वहीं ।

3

दिल का दर्द अपने से मुस्तहक़ रखना ,

हो सके उस विन्दु पे अपना हक़ रखना,

चाहत  से कौन  किसका होता है यहॉ,

सावन की तरह खु़द में इक महक़ रखना।।

4

जुल्म ढाया करे ,फ़न नचाया करे,

फ़र्क पड़ता नही,तन जलाया करे,

है”भ्रमर”की अनूठी,उदर कल्पना,

हुश्न  रोया  करे ,मन  हँसाया करे।।

 

रचयिता प्रेषक:–

विजय नारायण अग्रवाल “भ्रमर”

 

 

 

 

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