#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

शेर:–

 

मैने चाहा द्वार पर कुछ रोशनी होती रहे,

उसने पूरी तीरगी ही आशियॉ से दूर की।।

 

मुक्तक:–

 

रघुनन्दन की चेतना,रखती अलग प्रभाव,

जैसे तीरथ  द्वार  पर ,चहक  रही है  नाव,

बड़ा-छोट उसके लिए,नहीं जगत में कोय,

रख निष्ठा हनुमान की,मनके जोड़ो भाव।।

 

विजय नारायण अग्रवाल ‘भ्रमर’

 

 

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