#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

मुक्तक:–

 

मुझको बस आषीश चाहिये,

भाव विभव से बीस चाहिये,

जिससे सहमत सारा जग हो,

वही नीति जगदीश चाहिये।।

 

दोहा:–

1

रतना रहती विरतना,रत ना जानत लोग।

तुलसी प्रभु के हो गये,बिना लगाये भोग ।।

2

बिना लगाये भोग की ,युक्ति  हुयी  साकार।

तुलसी मानस काव्यकृति,पूज रहा सन्सार।।

 

‘भ्रमर ‘. रायबरेली

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