#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

दोहा:–

 

सुविधा भरी बजार में,

जो चाहे सो लेव।

अंगअंगरखा प्रेम रस,

राम कृष्न से देव।।

मुक्तक:–

 

संवेदना की देखो,

होती है रात ठगनी,

दहशत ज़दा इनायत,

पहने हुये बिकनी,

गाफ़िल ‘भ्रमर’ खु़दा से,

कैसे  ये  पूँछ  ले,

कि उसकी हयात मंजिल,

जाकर कहॉं है रुकनी।।

 

विजय नारायण अग्रवाल ‘भ्रमर’

रायबरेली

 

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