#Muktak by Vijay Narayan Agrwal

श्री राम वंदना:–

 

जड़ता हमरे तन में भरी है,

कैसे  मिलोगे  राम  जी।

गज गामिन सा मनवा मेरा,

भजत नहीं हरिनाम जी।।

1

दीप बुझा हिरदय का हमरे ,

बढ़ा हुआ अज्ञान है,

शरभंगी का दर्शन करना,

इच्छा का सम्मान है,

प्रतिभा में प्रतिपादन लायक,

भाव नही निष्काम जी–गज

2

सार वेद समझाय रहा यूँ,

जगत बिषय का ढेर है,

दमयंती ऑंचल में लिपटी,

यही समय का फेर है,

बालरूप दर्शन की इच्छा,

लेती नही विराम जी—गज

3

जनम मरण का बोध कराता,

नित्य हमें संसार है,

पेश कर रहा यमन का राजा,

जो उसका अधिकार है,

ईर्षा खड़ी दुपहरी रहती,

मिलकर सुबहो शाम जी–गज

4

जीवन है मिट्टी का ढेला,

ज्योतिर्मय दिनमान है,

चंचल चतुरा भाव समेटे,

“भ्रमर “बोध शैतान है,

द्रष्टा तुम हो पूर्ण जगत के,

पूर्ण करो धनधाम जी—गज

 

जड़ता हमरे तन में भरी है,

कैसे  मिलोगे  राम  जी।

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.