#Muktak by Vijay Naryan Agrwal

दोहा:–

कैसी विधिक विडम्बना,
कैसा समय विधान।
झूठ विभव रस पी रहा,
सच को मिलती ग्लानि।।

दोहा मुक्तक:–

मुखड़े पर शालीनता,
रखती रूप निखार,
परिचय दे शुरुआत में,
कामुक दिखत उदार,
आकुल मनुज ले ढूबे,
निष्ठा ढोती नाव,
परमारथ का स्वॉग रच,
धन में बढा़ विकार।।

विजय नारायण अग्रवाल ‘भ्रमर’
रायबरेली 27/08/2018

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