#Muktak by Yogendra Raghuvanshi

भीग रहा है तन मन मेरा रिमझिम रिमझिम बूँदों में।

होकर हरित लताएँ झूमें रिमझिम रिमझिम बूँदों में।।

सावन आया घुमड़ घुमड़ कर ख़ुशियाँ घर घर में आयीं

मोर पपीहा कोयल बोले रिमझिम रिमझिम बूँदों में।।

 **

हे! तम पोषक, प्रज्ञा विहीन,तुम धर्म प्रतिष्ठा क्यों न करो।

पाषाण हृदय को निश्छल कर,तुम कर्म प्रतिष्ठा क्यों न करो।।

बनकर “विवेक”, उत्थान करो,

विस्तार करो शुचि का जग में।

तुम ज्ञान दीप्ति विस्तृत कर के,निज मर्म प्रतिष्ठा क्यों न करो।

 

‘योगेन्द्र रघुवंशी’

धौलपुर

9311161113

761 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *