#Najm by Sufi Jakir Nawazi

नज्म़

मुजाहिद ए हक हूँ,
जुलमत से मैं ,
लडता रहा हूँ, लडता रहूंगा ।

कोई साथ आए न आए ,
तन्हा चलता रहा हूँ ,
चलता रहूंँगा।

अंधेरों में रहा हूँ ,
बनकर मैं आतिश,
जगमगा उठे न जमाना जब तक,
चिरागों को रौशन,
करता रहा हूँ , करता रहूंँगा ।

देते है हौसले, जमाने के पत्थर,
राह के काँटे , मुझे भा गए हैं ,
पुकारेगा जब भी,
कोई जुलमतकदे से,
आवाजे हक पर,
लब्बैक..
कहता रहा हूँ , कहता रहूंँगा ।।

सूफी जाकिर “नवाजी “

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