#Natak by Vidhya Sahnkar Vidhyarthi

चौराहे की जिंदगी

( हिंदी सामाजिक नाटक )

विद्या शंकर विद्यार्थी

पात्र परिचय

1. शरबतवाला – दुकानदार

2. लस्सीवाला – दुकानदार

3. चिंतनदास – कंजूस पिता

4. उत्सवदास – चिंतनदास का

लड़का

5. सिपाही – सिपाही

6. लड़का – लड़का

7. कलुटा लड़का – चोर लड़का

8. वृद्ध आदमी – उपेक्षित पिता

9. महेश – प्रतिष्ठित व्यक्ति

10. रमेश – महेश का समझदार

बेटा

11. चादरवाला – चादरवाला

अंक प्रथम

स्थान – चौराहा समय – भीषण

गर्मी

निर्देश – लोगों का आना जाना

लगा है |

चादरवाला – चादर लो भाई…

चादर… यह तिलक के लिए है…

यह दहेज के लिए है… यह लेन

के लिए है…. यह देन के लिए

है…. यह कल के लिए है… यह

आज के लिए है… यह घर के

लिए है… यह समाज के लिए

है… यह चाचा के लिए है… यह

भतीजा के लिए है…. यह साली

के लिए है… यह जीजा के लिए

है… यह छेका के लिए है… यह

शादी के लिए है….यह काँच

कुँआर के लिए है… यह बर

बरतुहार के लिए है… चादर बहुत

है भाई बहुत है… यह खादी है…

यह यह भागलपुरी है… यह

मिर्जापुरी है… यह जौनपुरी है

यह सुती है… यह सिल्कानी है…

यह कम कीमत की है…. यह

अधिक दम कीमत की है…

आओ भाई आओ… चादर ले

लो… यह डबल बेड के लिए है…

यह यह सिंगल बेड के लिए है…

यह चौकी के लिए है…. यह

पलंग के लिए है… यह दीवान के

लिए है… क्या सोचते हो भाई…

चादर से पहचान बनती है…

चादर ले लो भाई चादर…. |

( कुछ लोग पैसे

देते हैं और ले जाते हैं )

लड़का – यह कितने की है चाचा?

चादरवाला – लोगे ?

लड़का – हाँ,तभी तो पूछ रहा हूँ |

चादरवाला – दो सौ लगेंगे |

लड़का – तो दे दो चाचा |

चादरवाला – वाह, क्या होनहार

जैसी बातें करता है ….शालीनता

एेसे ही घर में पहतान बनाती है |

( वह शेष चादर को समेटते हुए

जाता है | ) ( चिंतनदास और

उत्सवदास दोनों बाप बेटे आते

हैं )

शरबतवाला – ( ऊँची आवाज में )

शरबत लो भाई…. शरबत…

अच्छा शरबत… ढण्ढा शरबत…

दिल खुश करने वाला शरबत…

मन को भाने वाला शरबत…

गर्मी मिटाने वाला शरबत…

समय बिताने वाला शरबत… पी

कर अजमाने वाला शरबत… धूप

से टकराने वाला शरबत… जगह

पर पैसे लगाने वाला शरबत… लू

को काटेगा… अपना नहीं, यहाँ

यही आँटेगा… घर से निकलते

हो… तेज धूप में, छाते लेकर

चलते हो… मन में विकार नहीं…

अधिकार से बोलता हूँ…

चेतावनी देता हूँ… शरबत देता

हूँ… न कि पानी देता हूँ… माना

कि बहुत सम्हलते हो… लेकिन

शरबत घर से लेकर नहीं चलते

हो… पैसे क्या मलते हो… यह

काजू का शरबत है… यह मेरे

बाजू का शरबत है… यह बादाम

का शरबत है… यह आम का

शरबत है… यह बेल नाम का

शरबत है… यह बिका शरबत

है… यह थोड़ा फिका शरबत है…

दुकान दादा के समय से ही चली

आ रही है भाई… अब पैसे

पेटीएम से भी देने की सुविधा

है… क्या सोचते हो भाई…

शरबत लो शरबत… |

लस्सीवाला – लस्सी लो भाई मेरी

लस्सी… गर्मी का दिन है… धूप

बहुत कड़ी है… पैसे क्यों देखते

हो भाई…. जिंदगी बहुत लंबी

है… किन्तु समस्या के ऊपर

समस्या खड़ी है… सोचो मत

भाई… लस्सी पी लो लस्सी…

बहुत राहत मिलेगी… बिल्कुल

चिंता मुक्त हो जाओगे…. क्या

लेकर आये हो… क्या लेकर

साथ जाओगे …सब यहीं का

यहीं रह जाएगा… जिंदगी से बढ़

कर कुछ नहीं है भाई… पैसे का

इतना महत्व क्यों देते हो…?

शरबतवाला – शरबत… शरबत…

शरबत गर्मी से निजात दिलाता है

भाई…. पानी से तो सिर्फ प्यास

जाती है… शरबत से गर्मी मिटती

है… शरबत लो भाई शरबत… |

( दोनों अपनी अपनी आवाज की

पुनरावृत्ति करते हैं )

चिंतनदास – बेटे… |

उत्सवदास – आपने मुझसे कुछ

कहा क्या पिता जी ?

चिंतनदास – (थोड़ा झुंझला कर )

ओहो… आरे बेटा, तुम भी मेरे ही

जैसा जब देखो तब सोचते ही

रहते हो…. न जाने किस चिंता में

पड़े रहते हो तुम भला… ( हाथ

ऊपर उठा कर ) हे भगवान, मैं

तो इससे अजीज आ गया हूँ… |

जब देखो तब कुछ न कुछ मेरे

ही जैसा सोचता ही रहता है |मेरे

जीते जी इसे भला इतना सोचने

की क्या जरूरत आ पड़ी है |

आखिर इतना असबाब बचा कर

मैं किसके लिए लाया हूँ, लगता है

इसकी यह सोच हमारी पूरी

लोटिया ही डूबो देगी |

उत्सवदास – कहिए पिता जी… |

चिंतनदास – ( झुंझलाता है )

कहिए पिता जी, क्या कहें या

नहीं कहें तुमसे… आरे बेटा मेरी

राह पर चलो मेरी राह पर,

समझा

| ( वह चुप है)

उत्सवदास – अपने पुत्र के लिए

यह एक पिता का वरदान है या

अभिशाप |

चिंतनदास – आरे बेटा, पत्थर

दिल वाला बाप भी नहीं चाहता

कि मेरे बेटे को तकलीफ हो…

जिंदगी में किसी तरह की

मुसीबत खड़ी हो… बंगला हो न

गाड़ी हो… और… और मैं तो

तेरा बाप ही ठहरा | और… और

मैं इस मुहल्ले में क्या पूरे शहर में

खाने पीने तथा एेश मौज नहीं

करने के मामले में बदनाम

आदमी हूँ, क्योंकि अपने हिसाब

से कंजूस जो हूँ | तुमने तो कभी

सोचा भी नहीं होगा कि मैं यह

कंजूसी करता हूँ तो किसके

लिए… तो आज तुम कान खोल

कर सुन लो इस शहर में कंजूस

हूँ तो मैं अपनी औलाद के लिए

मतलब तुम्हारे लिए |

उत्सवदास – तो ?

चिंतनदास – तो मैं तुमसे यह पूछ

रहा हूँ बेटा कि यह शरबत वाला

क्या बकता है….? बताओ तो

सही ….|

उत्सवदास – आप नहीं जानते

पिता जी, धंधा वाले प्राय: अपनी

बातों से लोगों को आकर्षित

करते हैं… और वस्तु से विशेष

उनकी बातें बिकती हैं |

चिंतनदास – (लंबी सांस लेतेहुए )

अच्छा, ये बात है… तूने बिल्कुल

ठीक कहा बेटा, अब मेरी समझ

में आयी उनकी बातें | जब लोग

उनकी बातों की बागजाल में

फँस जाते हैं तब उन्हें होश होती

है, कहाँ आ फँसे, हम …फँस

कर अफसोसते हैं… एेसे नहीं |

तब अब हम इनकी बातों में नहीं

हैं आने वाले …तूने ससमय

शतर्क कराया हमें… चलो चलो

आगे बढ़ते हैं |

लस्सीवाला – आरे चाचा जी

देहात से आये हो क्या ?

चिंतनदास – आरे भाई, हम देहात

से आयें या शहर से… इससे तुम्हें

क्या मतलब ?

शरबतवाला – मतलब तो है चाचा

जी, हमें आपसे वास्ता भी है…

क्योंकि आप जो अपने ठहरे…

वह भी हमारे शहर के | दरअसल

बातें ऐसी है चाचा जी कि कुछ

लोग ऐसे हैं कि नहीं पूछो तो गर्मी

सह लेगें… भारी कंजूस की तरह

लेकिन पंद्रह रूपये अपने जीव

पर खर्च नहीं करेंगे… जेब दबाये

घर चले जायेंगे… चाचा जी आप

उन कंजूसों में थोड़े हैं… आप तो

उदाहरण के पात्र भी नहीं हैं |

लस्सीवाला – आरे रमुआ |

शरबतवाला – कहो भैया |

लस्सीवाला – उन्हें यह भी बता दे

कि वैसे कंजूस घर जाते हैं तो

बीमार पड़ जाते हैं… लू लग

जाती है… हमारी लस्सी और

तुम्हारा ठण्ढा शरबत ही तो

बचाते हैं… चलती भीषण गर्मी में |

क्रमश: – जारी

 

**********

चौराहे की जिंदगी

 

विद्या शंकर विद्यार्थी

 

गतांश – जारी

 

शरबतवाला –  कैसे नहीं…

 

तुम्हारी लस्सी भी बचाती है और

 

हमारा शरबत भी मिजाज तर

 

कर देता है जो…. |

 

लस्सीवाला –  पन्द्रह रुपये की

 

जगह पांच हजार हँसकर डॉक्टर

 

को दे देंगे… राम राम लानत है

 

ऐसी सोच को… लगता है जायेंगे

 

तो सारी संपत्ति साथ लेते जायेंगे |

 

उत्सवदास –  ( फटकार लगाते )

 

आरे भाई, डॉक्टर को हँस कर

 

देंगे या रो कर देंगे, तुम दोनों को

 

किस बात की चिंता सताये जा

 

रही है… क्यों उनका फिक्र अपने

 

सिर लिए दबे जा रहे हो…?

 

( नकारते हुए ) जाओ…

 

जाओ… आगे बढ़ो… बेचो किसी

 

और को, हम नहीं हैं शरबत या

 

लस्सी पीने वाले… वैसे भी

 

बाजार की चीज से सख्त परहेज

 

है हमें… क्या पिता जी…?

 

चिंतनदास –  तुमने बिल्कुल ठीक

 

कहा… हम भी यही कहते इन्हें…

 

आरे बेटा, दूध दही तो आज कल

 

असली मिलता नहीं तो ये लायेंगे

 

कहाँ से…?

 

लस्सीवाला –  चाचा जी, असली

 

बात आप पकड़े हैं… लेकिन

 

आप माने या नहीं माने चाचा जी

 

प्रभुआ की लस्सी प्रभुआ जैसी

 

ही होती है… रही बात अब पैसे

 

की, आप जैसे ग्राहक को छोड़

 

हमें कम पैसे देते हैं तो बस

 

पुलिस वाले… सभी नहीं… सच

 

चाचा जी और हाँ कमीज का

 

गला काटने वाले भी पुलिस से

 

कम नहीं हैं… आप मानिए या न

 

मानिए… कमीज का गला काटते

 

काटते हमें भी काटने की आदत

 

हो गयी है उनकी… शाम को जब

 

हम घर जाते हैं तो हमसे हमारी

 

बीबी पूछती है… |

 

शरबतवाला –  आरे क्या पूछती है

 

भैया… जरा मुझसे भी तो

 

सुनाओ…?

 

लस्सीवाला –  तुम्हें मैं बाद में

 

सुनाऊँगा रमुआ, अभी चाचा जी

 

को लस्सी देने दो मुझे… लीजिए

 

चाचा जी छाल्ही सहित देता हूँ…

 

दिल खोल कर पीजिए…आप

 

भी लीजिए इस चौराहे पर जो

 

भी वह प्रभुआ की लस्सी पी कर

 

ही जाता है… बन जाता है

 

ग्राहक… ग्राहक को लगता है कि

 

प्रभुआ फँसा लिया और प्रभुआ

 

को ग्राहक फँसा लिया… लेकिन

 

यहाँ किसी को कोई नहीं फँसाता

 

है चाचा जी… दरअसल प्रभुआ

 

की लस्सी बुलाती है… |

 

(सिपाही डण्डा हिलाते आता है

 

|)

 

सिपाही –  आरे का है रे प्रभुआ…

 

देखता है आज कितनी गर्मी है

 

ससुरी…?

 

लस्सीवाला –  कहिए साहब…आ

 

गये आप… डंडा भांजते |

 

सिपाही –  हाँ आ गये रे… और

 

डंडा लगाते भी |

 

लस्सीवाला – सुबह से अभी तक

 

कितने पर पड़े होंगे आपके ये

 

डंडे साहब ?

 

सिपाही –  आरे एक तुम्हीं तो

 

बाकी रह गया है, मन है तो बोल

 

तुम्हारी भी लगी इच्छा पुरी कर

 

दें |

 

लस्सीवाला – क्षमा करें हजूर

 

क्षमा, सेवा जो कहिए करने के

 

लिए तैयार हूँ, आपका |

 

खातिदारी में कहीं से कोई कमी

 

नहीं होगी | हम तो खातिरदारी

 

के लिए ही बने हैं |

 

सिपाही –  आरे हमको भी बोलना

 

ही पड़ेगा रे आँय वह भी

 

सरकारी मुलाजिम को… समझ

 

में नहीं है तुम्हें का कि आज

 

कितनी गर्मी है ससुरी कि जीव

 

अकबका जाता है… हमरे

 

छत्रछाया में नहीं रहना है क्या

 

तुम्हें… आँय…?

 

लस्सीवाला –  कैसै नहीं… रहना

 

है साहब, हमें सब समझ में है

 

साहब… नहीं समझेंगे तो जायेंगे

 

कहाँ ? गाँव के गुण्डे गाँव वालों

 

को तंग करते हैं और सताते हैं…

 

और शहर के आप चाचा जो,

 

हमें गाँव थोड़े जाना है… बीबी

 

बच्चे साथ लेकर हमें रहना है तो

 

आपही की छत्रछाया में… |

 

सिपाही –  अबे एएएए… तुम मुझे

 

गुण्डा क्या बोला बे… देखता है

 

कि नहीं ये डंडे मेरे… |

 

लस्सीवाला –  नहीं नहीं साहब

 

आप तो गुण्डों के चाचा हैं… सच

 

साहब आप नहीं होते तो इस

 

शहर के गुण्डे मुझे जीने नहीं

 

देते… | क्या रमुआ ?

 

शरबतवाला –  ( भाव देते ) हाँ

 

साहब हाँ |

 

सिपाही –  ( मुछ एेंठते ) ओ

 

समझ गया… तो इसी बात पर

 

एक गिलास लस्सी बढ़ा मुँह का

 

देखता है कब का ? आँय  ?

 

छाल्ही भी भी डाल देना हाँ…

 

कह देता हूँ…नहीं तो तेरा भूत

 

उतार दूँगा मैं… समझा  ?

 

लस्सीवाला –  समझा साहब सब

 

समझा |

 

लस्सीवाला –  जिसके हाथ में

 

डण्डा

 

कौन डालेगा अडंगा |

 

पूरा दूँगा पूरा लीजिए

 

वर्दी का मजा लीजिए |

 

पतला नहीं गढ़ा दूँगा

 

और गिलास बढ़ा दूँगा |

 

लू न आपसे सट पायेगी

 

सारी गर्मी कट जायेगी |

 

है प्रभुआ भले ही गरीब

 

लेकिन है आपके करीब |

 

आपके जैसे आते हैं कितने

 

कहाँ पैसे वो देते हैं इतने |

 

बीस तो सभी जगह आते हैं

 

यहाँ तो हम पंद्रह पाते हैं |

 

उस पर भी औरों की मार

 

फिर भी जिंदा हूँ सरकार |

 

तोंद वाले तो और हैं डांटते

 

कहते हैं कि तुम हो काटते |

 

छूरा है न पास में है कटार

 

कैसे काटूँगा भला मैं सरकार |

 

सिपाही –  जो भी तुमको करे तबाह

 

लाओ उसको मेरी राह |

 

दिखा दिया न पुलिस का खेल

 

निकाल दिया न जो पूरा तेल |

 

क्रमश: – जारी

 

शेषांश – जारी ( अंतिम भाग )

चौराहे की जिंदगी

( हिंदी सामाजिक नाटक )

विद्या शंकर विद्यार्थी

अंक द्वितीय

निर्देश – ( एक लड़का काले

कलुटे लड़के को खदेड़ते हुए

पीछा करता आता है और

उसका कॉलर पकड़ कर जोर

का झटका देता है | )

लड़का – हरामजादा, तेरा मुँह

तोड़ दूँगा मैं क्या समझता है

अपने आप को… |

कलुटा – यह मुझे मारता

है …बचाइए साहब मुझे इससे…

आपके पाँव पड़ता हूँ… मुझे

बचाइए साहब… हाथ जोड़ता हूँ

बिना कसूर किये मुझे मारता है

साहब…. |

लड़का – हरामजादा, तुम्हें मैं

बिना कसूर किये मारता हूँ….

चोर..ले और मार खा..और..|

( इतना मारता है कि वह गिर

जाता है | )

कलुटा – आपने इसका

अत्याचार देखा और सुना

साहब… सुना यह मुझे चोर

बोलता है… मारता भी है

साहब… हाथ जोड़ता हूँ साहब

बचाइए मुझे बचाइए इससे… |

सिपाही – ठहरो बेटा ठहरो इसे

अब मत मारो… |

लड़का – आप मुझे इसे जी भर

मारने दीजिए मत रोकिए मुझे..

यह चोर है चोर |

सिपाही – चोर है ?

लड़का – हाँ हाँ… उचाका…

सामान लेकर भागने वाला यह

चोर है |

सिपाही – क्यों बे… हरामजादा

तुम चोर है | बोल सच सच

बोल… |

कलुटा – नहीं साहब | माँ कसम

मैं चोर नहीं हूँ | ( फिर पैर

पकड़ता )

लड़का – हरामजादा, अपने आप

को दूध का धोया ठहराने के

लिए तूने पवित्र जैसी माँ को भी

नहीं छोड़ा | कसम खा गया |

जब कसम ही खाना था तो

अपनी आँखों की कसम खात |

माँ को अपित्र कर दिया | मैं

कहता हूँ इसके और मेरे बीच से

आप हट जाइए साहब मुझे इसे

मारने दीजिए यह चोर है | चोर

को आप हिफाजत मत दीजिए

साहब बर्ना पुलिस की वर्दी से

हमारा विश्वास मिट जायेगा |

दाग मयी हो जायेगी आपकी

वर्दी | आप चोर का पक्ष ले रहे हैं
|

सिपाही – किसी को चोर ठहराने

के लिए वर्दी को सबूत चाहिए…

पुलिस की वर्दी सबूत चाहती

है… दोगे सबूत… ?

लड़का – ( जोरदार स्वर में )

हाँ…. हाँ… हाँ मैं दूँगा सबूत…

इसके जेब में सोने की चैन है,

वह मेरी बहन की है… मेरी बहन

नल पर मुँह धो रही थी कि

हरामजादा इतने में यह ले

भागा… |

सिपाही – क्यों बे, अभी तक तो

थप्पड़ घूसा ही खा रहा था अब

यह डंडा भी खायेगा… सच सच

बोल सही मामला क्या है ?

कलुटा – ( कांपते हुए ) बात सच

है साहब, मैने चैन उड़ाया

है …चैन मेरे पास है लेकिन मुझे

डंडे मत लगाइए साहब मैं

आपके पाँव पड़ता हूँ… क्षमा

माँगता हूँ साहब क्षमा… अब

जीवन में ऐसा काम नहीं करूँगा

साहब… माँ कसम… कभी भी

नहीं साहब कभी नहीं… कान

पकड़ता हूँ, माँ कसम साहब…. |

वृद्ध आदमी – ( कातर स्वर में )

हा…हा…. हा…. माँ कसम कभी

नहीं… हा…. हा…. हा…. बाप

कसम कभी नहीं…. लोग कसम

ही तो खाते हैं यहाँ…. इस जीवन

में…. राह पर कब आते हैं… मेरी

जिंदगी की सच्चई सुनोगे…

तैयार हो लोगों… ?

लड़का – दादा, तुम बोलो तो सही

| तुम्हारे साथ क्या अन्याय हुआ

है दादा ? तुम्हारी फटेहाली की

स्थिति क्यों है दादा ? दादा तुम्हें

कभी हँसी तो कभी रूलायी क्यों

आती है दादा… दादा… तुम

मुझसे कुछ बताओ दादा…. |

वृद्ध आदमी – क्या कहा दादा…?

हा…. हा… हा… ( खूब हँसता है

फिर रोता है ) मुझे तो अब मेरा

बेटा ही नहीं है तो तो मैं दादा

कहाँ से हूँगा… दुनिया वालों

अपने बेटे के लिए मैंने क्या नहीं

किया… पढ़ाया लिखाया पैसे

कैसे कैसे कहाँ से लाया उसे

जानने भी नहीं दिया और किसी

दिन आधी रोटी ही खाकर सो

रहा… मैं… यह सोच कर कि

बेटा जब भर पेट खायेगा तो

उसकी पढ़ाई अच्छी होगी….

सच मानो दुनिया वालो उसकी

पढ़ाई अच्छी हुई भी… इतनी

अच्छी कि हमारी तकलीफ

उसकी खुशी बन गई… वह हमारे

जैसा नहीं रहा… बल्कि एक

अॉफिसर बन गया एक

मेहनतकश आम आदमी का

बेटा अॉफिसर … हा… हा….

हा…. मुझे खुशी का ठिकाना

नहीं रहा लोगों…. सबने मुझे

अॉफिसर बेटा का हीरा बाप

कहा… हा… हा… हा… हीरा

बाप … लेकिन दुनिया वालों देख

लो मुझे कि अब मैं किस

अॉफिसर बेटा का बहुमूल्य हीरा

बाप हूँ…. देख लो अपनी खुली

नजरों से देख लो.. जिसे खाने के

लिए न रोटी न पहनने के लिए

कपड़े और न ही रहने के लिए

घर भी रहा… |

लड़का – हुआ क्या ?

वृद्ध आदमी – हा… हा… हा…

हुआ यह दुनिया वालों कि घर में

नयी बहू आयी कुछ दिनों तक

मैंने यह नहीं समझा कि यह मेरी

बेटी नहीं है लेकिन ( और जोर

से रोता है ) लेकिन वह मेरी बेटी

और बहू क्या बनेगी… काँटे बन

गयी… एक दिन उसने मेरे बेटे से

कहा – ” तुम्हारा बाप नौकर जैसा

भी नहीं लगता है… दरवाजे पर

जब बड़े लोग आते हैं तो हमारी

नाक कट जाती है… इन्हें कहीं ले

जाकर छोड़ आओ… ” हा….

हा… हा…. हा…. हा… हा….सच

दुनिया वालों मैं उसी बहू और

बेटे का कटा हुआ आज नाक हूँ

| इस जमाने का बेकार नाक |

जो घर की सभ्यता को भाये नहीं

| हा… हा… हा… हा अपने बेटे

का कप उठाने का काम आया

नहीं | बेटा ने कहा पापा मैं आज

आपको तीर्थ करा लाता हूँ…

मुझे क्या पता दुनिया के लोगों

कि आधी रात को जिस जगह

वह मुझे छोड़ रहा है वह तीर्थ

स्थल नहीं बल्कि अपरिचित

शहर का बस डिपो होगा… हाय

रे मेरे भाग्य हाय रे कर्तव्य… दोष

किसे दूँ …अपने भाग्य का या

अपने कर्तव्य का… बोलो दुनिया

वालों बोलो… कुछ भी तो

बोलो…. चुप क्यों हो… मैं

जानता हूँ तुम्हारे पास कोई

जवाब नहीं है… तो… वह भी

जवाब मेरे ही पास है लो कान

खोल सुनो जब उसने मुझे पापा

कहा उस समय ही सतर्क हो

जाना चाहिए था क्यों हा… हा …

हा… पापा का मतलब कि उसके

लिए मैं पाप था पाप…. हा…

हा… हा… बाप नहीं पाप….

पश्चिम की सभ्यता में पाप

दुनिया वालों…. किन्तु भारतीय

सभ्यता बाप को बाप बताती

है…. हा…. हा…. सद्भावना

कहती है लोग पापा को छोड़ देते

हैं लेकिन बाप को नहीं छोड़ते…

हा…. हा… ( लड़के से )

वृद्ध आदमी – क्या कहा मैंने…?

लड़का – सद्भावना कहती है |

वृद्ध आदमी – हाँ हाँ… सद्भावना

ही कहा था शायद मैंने… |

सद्भावना ही तो भारतीय

संस्कृति की आत्मा है |

सद्भावना नहीं तो संस्कृति की

आत्मा ही नहीं | विनष्ट हो है

लोगों की सोच | ( अपने पिता

महेश के साथ रमेश आता है | )

अंक तृतीय

महेश – बेटा, यह कौन आदमी है

जो सद्भावना की व्याख्या किये

थक नहीं रहा है ?

रमेश – आदमी तो अपरिचित ही

लग रहा है पिता जी… लेकिन

लगता है वक्त का मारा इंसान है |

वृद्ध आदमी – क्या कहा तूने वक्त

का मारा ?

रमेश – हाँ हाँ वक्त का मारा…

और मैंने आपको इंसान भी

कहा… मेरी बात से कोई चोट तो

नहीं लगी आपको….?

वृद्ध आदमी – वक्त का मारा नहीं

अपने बेटा का त्यागा मैं बाप हूँ,

बेटा |

रमेश – आप मेरे घर चलेंगे ?

वृद्ध आदमी – क्यों… और वह

किस रिश्ता से ?

महेश – श्रीमान् , आपने मेरे बेटे

को बेटा कहा है… आप मेरे भाई

बराबर हुए… इस रिश्ता से | क्या

मैं आपसे यह उम्मीद छोड़ दूँ ?

भारतीय संस्कृति में जुबान की

भी तो अपनी कीमत होती है |

वृद्ध आदमी – चलूँगी अब मैं

आपके घर चलूँगा… करूँगा

अपने जुबान से निकाले शब्द का

पालन करूँगा | आपकी आधी

रोटी में भी मैं पूरी रोटी का

सपना देखूँगा …मानूँगा मैं उसे

पूरी रोटी ही मानूँगा | बदलूँगा

अपनी सोच बदलूँगा – चौराहे से

मेरी खुशी मिल गई चौराहे से

मेरी जिंदगी मिल गई |

रमेश – लाओ प्रभू, ऐसे महान

व्यक्ति के लिए एक गिलास

लस्सी लाओ |

वृद्ध आदमी – ( आँसू पोछते

हुए ) भाई सिर्फ मेरे लिए ?

महेश – नहीं, हम तीनों के लिए |

और कहिए कुछ… |

वृद्ध आदमी – और कुछ कहने

के लिए आपने कुछ छोड़ा ही

कहाँ…. महान है आपकी

शालीनता |

( प्रभू लस्सी लाता है )

शरबतवाला – महेश चाचा, आप

लोग हमरा शरबत नहीं पीएगें ?

महेश – कैसै नहीं, जब आ गये हैं

तो जरूर पीएगें | अकेले नहीं

हम तीनों साथ पीएगें |

चिंतनदास – और आज से हम

भी अपनी राह बदलेंगे …क्या

बेटा तुम्हारी इच्छा क्या है ?

उत्सवदास – पिता की इच्छा से

जूदा बेटे की इच्छा थोड़े ही

होगी, हमारी सहमति आपके

साथ है पिता जी |

( महेश और वृद्ध आदमी की ओर

इशारा करता है )

शरबतवाला – प्रभू भैया, आज

हमलोग ऐसे महान आदमी में

देवत्व का दर्शन कर रहे हैं |

लस्सीवाला – बिल्कुल भाई, एेसे

ही व्यक्तित्व की जरूरत है यहाँ |

स्वर्ग नहीं इंसान चाहिए

बाँसुरी नहीं तान चाहिए

बोलो सभी साथ बोलो

आदमी हीरा महान चाहिए |

( प्रभू अपने अंतस् के भाव को

रोक नहीं पाता है और गाने

लगता है )

लस्सीवाला – माता ना पिता का

साथ दिया तो कौन बड़ा उपकार

किया

रोती है पिता की आत्मा तो

समझो दुनिया यह सुनी है

तूने जो अलग राहें है चुनी वह भी

राहें तेरी सुनी है

मन में न यदि विचार किया, तो

कौन बड़ा उपकार किया |

कश्तियाँ हैं कहीं बस्तियाँ हैं कहीं

उनके लिये जग सुना है

हँसना कैसा, सपना कैसा, मुरख

का तूँ एक नमूना है

झूठा बस पर्व त्यौहार किया, तो

कौन बडा उपकार किया |

आती बुढ़ापा आती है हृदय को

कचोट वह जाती है

कौन पराये अपने हैं जिंदगी को

याद दिलाती है

छुआ न चरन नमस्कार किया, तो

कौन बड़ा उपकार किया |

पत्थर को पूजा तो क्या पूजा,

देवता सा इंसान जब रोता है

पत्थर का भी होता है दिल अपना

छूता है पत्थर तो रोता है

पिता को जहाँ भिखार किया, तो

कौन बड़ा उपकार किया |

| ईति श्री |

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.