#Nazm BySufi Jakir Nawazi

बेरोजगारी ( एक नज़्म )

लम्बी -लम्बी सड़कें ,

और

थके हारे कदम ।।

अखबारों की कतरन से ,

भरी जेब ,

और फुसफुसाते हुए,

कुछ सिक्के ,

आँखें !

मायूसी पर डालती ,

चिलमन ।।

दी दस्तक जहां कहीं,

सुने सुनाए अल्फाज वही ,

‘नो वैकेंसी ‘

खुले बाजार ,

और दरवाजे बंद ।।

दिन भर की मसरूफियत

और बेकार सी शाम ,

अपनों के अरमां,

गैरों की बातें ,

बचपन के वो ख्वाब ,

करवटें बदलती रातें ,

जिंदगी की दहलीज पर ,

फूलता दम ।।

लंबी लंबी सड़कें ,

और थके हारे कदम ।।

सूफी जाकिर नवाजी

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