0218 – Vikram Gathania

Kavita:

अगली प्रेमलीला

एक सुंदर जगह है चंबा
यहाँ की धरती का कण कण
वनस्पतियाँ यहाँ की
दिल धड़क धड़क जाता है इनसे
इश्क  झरता है इनसे !

मुग्ध हुए बिना रह नहीं सकते
हवायें बहती हैं
चौंकाती कहती हैं – मत खोओ !

प्रेम की एक जगह है चंबा
यहाँ का भूगोल
ऐसी घाटियाँ और रास्ते हैं
सब जैसे प्रेम के ही वास्ते हैं !

अपना अगला जन्म यहीं हो
इसी इच्छा से
मैंने निश्चय किया है
पत्नी से तय किया है
अगले जन्म हम चंबा में मिलेंगे
यहीं होगी हमारी अगली प्रेमलीला !


Kavita:

घर से दूर

घर से दूर गये आदमी को
याद आता है घर !

उसे याद आती है वह चिड़िया
मुंडेर पर जो बैठा करती है
छत पर
पानी के कटोरे के पास
जो मंडराती है
और बिखरे दानों के पास
जो होती है !

घर से दूर गया आदमी घर की याद में
चिड़िया हो जाना चाहता है
प्रेम स्वार्थ के बिल्कुल ही पास की
चीज़ नहीं होती
कि वह दानों के लिए
या कि पानी के लिए हुआ करती है !

और चिड़िया की याद भी नहीं है प्रेम
प्रेम एक चिर अतृप्त प्यास है
जो जगाया करती है तड़प
साक्षात मिलन के लिए
मिलन अबधि में
बेशक रहा ही करता है भाव
तृप्ति का सा।


Kavita:

घर से दूर

घर से दूर गये आदमी को
याद आता है घर !

उसे याद आती है वह चिड़िया
मुंडेर पर जो बैठा करती है
छत पर
पानी के कटोरे के पास
जो मंडराती है
और बिखरे दानों के पास
जो होती है !

घर से दूर गया आदमी घर की याद में
चिड़िया हो जाना चाहता है
प्रेम स्वार्थ के बिल्कुल आर या पार की
चीज़ नहीं होती
कि वह दानों के लिए
या कि पानी के लिए हुआ करती है !

और चिड़िया की याद भी नहीं है प्रेम
प्रेम एक चिर अतृप्त प्यास है
जो जगाया करती है तड़प
साक्षात मिलन के लिए
मिलन अबधि में
बेशक रहा ही करता है भाव
तृप्ति का सा।


Kavita:

तर्जनी आजकल

जब तुम उठाते हो उंगली किसी की तरफ
तुम्हारी तरफ तीन उठती हैं
यह सही नहीं कहा है किसी ने
तुम उंगली उठाया करो
बस यूं न उठाया करो तुम
उंगली किसी की भी तरफ !

तीन उंगलियाँ तो मद�द करती हैं
तर्जनी को उठाने में
जितना उसे उठना चाहिए
उतना उठाने में
अंगूठा भी साथ देता है
साथ निभाने में
यहाँ तो हाथ
सारा ही उठ जाता है
तर्जनी को उठाने में  !

तर्जनी उठकर
अंगूठे से मिलकर
उठा लेती है कलम भी
उतर जाती है रूह भी
कागज पर भी
उंगली हो जाती है इस तरह भी !

तर्जनी आजकल पहले की तरह
नहीं लेती है मद�द अंगूठे की
अक्सर ही
वह बटन दबाती है
या छूती है हिन्सों को
कमाल हो जाता है
इतना सा करने पर
उससे लिखा कहीं भी पहुंच जाता है
दुनिया के किसी भी हिस्से में
बिना किसी देरी के !

इस तरह
ये जो बीफ बीफ करते हैं
ऐन चुनाव के दिनों में
वे गोहत्या के
मतलब पशुवध के ही पक्ष में
बोल रहे होते हैं
वे जनता को मूर्ख बनाते हैं
वे किसी की भी
भावना से खेल रहे होते हैं
यही तर्जनी ही काफी है आजकल
उनको सबक सिखाने में !


Kavita:

दिखता है समय

दिखता है समय
जीवों के बनने मिटने में
बढ़ने घटने में बनस्पतियों के
क्रियाशीलता में आसपास की
तब तुम भी होते हो प्रवाहमान
गतशील समय के साथ ही !

गतशीलता तो
स्वाभाव में ही हो�ती है हर प्राणी के
चलते बढ़ते कहाँ से कहाँ तक
चल जाता है या बढ़ जाता है कोई भी प्राणी
समय की दूरियाँ नप जाती हैं इस तरह  ही !

समय तो महत्वपूर्ण इतना
कि इसकी कमी इस तरह भी हो जाती है कभी
कि जूतों तक को
कपड़ा तक नहीं मार सकते
झुककर
घर से निकलने से पहले ही
कि चलते चलते
मोजा पहना पाँव भी नहीं निकाल सकते  जूते से खड़े होकर
फिराने के ख्याल से जूतों के ऊपर
इस तरह भी तो कुछ साफ हो सकते जूते
डर होता है कि कहीं  देर न हो जाए
कि छूट न जाए कहीं काम कोई  करने से
हर काम का अपना समय होता है
हर काम कसा ही होता है हरदम
समय की कसौटी पर !

समय की कसौटी पर कसे ही
वीत जाता है जीवन
पर्याप्त भी तो नहीं होता समय
जीवन में भी !


Kavita:

विवेक खोये दिनों में

हमें हमारे हालात
वरदान लग सकते हैं
जब हमें अनावश्यक
झूठ मूठ से उपजी
सहानुभूति नहीं  मिलती है
जब हम जूझते हुए लगते हैं
मिल भेंट आते हैं  नये लोगों से
जिन्हें हम आये गये प्राणी ही लगते हैं ।

दरअसल दिन अच्छे ही होते हैं
किन्हीं दिनों को बुरा कहने के लिए
हम सचमुच में खो देते हैं जब अजीजों  को
वही हो सकती है एक वजह
किन्हीं दिनों में
भले ही उपजते  हों रिश्ते
चलते फिरते इस संसार में
जिन्हें हम अगर खोते भी हैं
इस चलते फिरते संसार की गति
हम नहीं रोक सकते ।

हम अचानक बेवजह
किन्हीं दिनों में दुख में घिरते  हैं जब
विवेक खोते हैं
तब हमें निश्चित ही इंतजार करना चाहिए
उनके बीत जाने का
अपने संभव प्रयास जारी रखते हुए
हमारे  प्रयास चमत्कार सिद्ध हो जाते हैं एक दिन
वशर्ते हम दूसरों के बहकावे में न आते हों
उन विवेक खोये दिनों में ।


Kavita:

बरसात के पानियों से

अब घूमने निकला हूँ
चीजें बहुत साफ हैं
बहुत दिनों बाद
बरसात का मौसम था
गहराये रहे बादल
ऐसे जी कर आ गए हैं इन दिनों
जैसे कोई डुबकी लगाकर किसी पोखर में
भीगा निकल आता है बाहर !

अब खुले में साँस ली जा सकेगी
देखना अब ये है
ये जो कई घासें हैं उगी हुई समेट ली जाएंगी
घर ले जाई जाएंगी बाँध कर गठ्ठों में
लादकर सिरों पर
यही मिलता है बरसात के पानियों से
झेल कर सब दुश्वारियों को !

पानी अब पोखरों में बंद मिलेगा
जमीन के अंदर भी
नाले खड्डें सूख जाएंगे
धरती हरी भरी रहेगी
पतझड़ के आने तक !


Kavita:

भीड़ का चेहरा

लोगों को चाहिए तमाशा
और ऐसा होता भी नहीं
कि तमाशे की भीड़ का चेहरा नहीं होता
तमाशे के नाम पर
एक आदमी जो तमाशा होता है
वही होता है भीड़ का चेहरा !

स्वांग रचता हुआ वह आदमी
धर्म को एक ढकोसला चरितार्थ करता है
धर्म को मोक्ष का बहुत बड़ा मार्ग बताते हुए !

और भीड़ अंदर ही अंदर कई समूहों में बंट जाती है
कई स्तरों पर मंथन चलना आरंभ होता है
ढके दबे से एक वर्ग का रोजगार चल पड़ता है !

श्रद्धालुओं की बलात्कारित लड़कियाँ
एक बड़ा आधार बनती हैं उस धंधे की
एक बड़ा गुंडा फिर दूसरे गुंडों के संरक्षण में
अपनी बहुरुपिया छवि को समादृत करवाता है भीड़ में
भीड़ को बहलाता है आवश्यक रूप से !


Kavita:

पानी में घिरे लोग

पानी में घिरे लोग
डूबने के खिलाफ होते हैं
फिर भी हड़बड़ी में पुल पर चले आते हैं
जबकि पुल गिरने के कगार पर होता है
इसलिए पुल भी उनके खिलाफ होता है
फिर भी पाँव उनके
पुल पर बढ़ ही जाते हैं
इस युक्ति से वे
या तो बच जाते हैं
या डूब जाते हैं !

वे जो डूब जाते हैं
नदी की मुख्य धारा में बहते हुए
दूर तक देखे जाते हैं अंतिम बार !


Kavita:

व्यक्तिगत सत्ता

हर आदमी की व्यक्तिगत सत्ता होती है
आँखें खुली होती हैं
चलती हैं टाँगें
होंठों से झरते हैं शब्द
ईश्वरीय कृपा से
दिखते हुए सजीव
कर्तव्यपालना होती है
और आदमी शक्तिशाली होकर
एक जिंदा आदमी का रूप हो जाता है !

रात को तो सोता है आदमी
सौंप कर अपनी सत्ता
ईश्वर को !


Kavita:

आदमी के स्वार्थ बोलते हैं

आदमी के स्वार्थ बोलते हैं
जैसे कि कभीकभी
आदमी के पुण्य बोलते हैं
पाप बोलते हैं !

हम किसी के बोलने मात्र से
थाह पा जाते उसके मन की
या कभीकभी  दिल की भी
तब हम दुख का निर्माण करते हैं
या कि सुख का
यह हम पर कि हम काले हैं
कि गोरे हैं दिल के !

जब हम दिल की थाह पा जाते
दिल की थाह पा लेने देता है जब कोई
और हम भी हुए  दिल के गोरे
तो हम प्रेम का निर्माण कर जाते हैं !


Kavita :

रीति रिवाज़ सुंदर

उसने कभी कहा ही नहीं हो स्त्री से
कि वह धरा करे सिर पर चादरु
जब होओ बड़ों के सामने
तब भी नहीं
जब लाया हो उसे व्याह कर
तब तो वह लड़का ही हो
स्त्री को अच्छा लगता रहा हो तब
सिर पर रखे रखना चादरु
सजना संवरना
तभी तो
ऐसी स्थिति पहले आई नहीं हो
कि बढ़ी उम्र में
कहना पड़ा हो
कि वह सिर पर रखा करे चादरु
जब होओ बड़ों के सामने !

बड़ा कब हो जाता आदमी
पता नहीं चलता
पड़ोस की बहू
उसके तनिक अपमान के लिए
नंगे सिर कब घूम जाए
अपने आँगन में
जानते बूझते
कि वह कुछ ठीक करना चाहती हो
अपने आसपास का
तब ठनके माथा
ऐसे नंगे सिर वाले रुप
अपनी स्त्री के
वह देखते आया हो
एक दो दिन से
यही देखा हो पड़ोस की बहू ने भी
उसके घर के किसी बड़े का निरादर करते हुए
और दिख जाए भी
जब वह खुद  अपमानित हुआ हो
उसके एक घंटे के अंदर ही
कि स्त्री बैठ जाए इत्मीनान से
कंकड़ छाँटने दाल के
तब कहना पड़ जाए स्त्री से
हिम्मत से
कि वह सिर पर धरा करे चादरु
ऐसा भी नहीं है
कि बड़ी बूढ़ी हो गयी हो
कि चादरु न धरो सिर पर
बैठो इस तरह
मतलब
चादरु ओढ़कर सिर पर
सुंदर न दिखो
यही एक बात स्वीकार करे स्त्री
एकदम से
कि उसे पता ही होता है
कि मर्द का अपमान तो क्या
अपना  अपमान भी होता है
अवमानना से
सुंदर रीति रिवाजों की
अनुशासन के !


Kavita :

युद्ध करो

यह युद्ध है
लड़ो इसे
बचाव की मुद्रा में
इसका सामना न करो !

वे आत्मघाती हैं
वे युद्ध ही लड़ रहे हैं  !

वे दुस्साहसी हैं
वे युद्ध मोल लिए लड़ रहे हैं
लड़ो इसे !

युद्ध करो !


Kavita :

एक अच्छी कविता

एक अच्छी कविता को
कभीकभी तरस जाता है मन
कुछ लिखने वाले हैं
जिनके माध्यम से कुछ शब्द
सार्थक घुसपैठ नहीं करते
और उन्हीं की मार्फत
वे लिखने वाले
कवि शब्द को हथिया लेते हैं
तब उनकी कविता
मनोरंजन की वस्तु भी नहीं रह जाती
एक अच्छी कविता नहीं भी होती !

यह धुंध में लिपटा सूरज
स्पष्ट एक दृश्य है संपूर्ण
और जो लिखने वाला है
वह इसे देखने में
और लिखने में
एक अंतर रखता है
कि कविता
सुंदर शब्दों की ही वाहक होती है
तभी तो कुछ शब्द
निर्रथक घुसपैठ कर जाते हैं
और एक अच्छी कविता से
हम बंचित हो जाते हैं  !


Kavita :

विधवा का चेहरा

किसी के भी कर्मों के वास्ते
आती है किस्मत  !

यह किस्मत की चमक
किसी चेहरे से
कहीं से भी
ला के दिखाऊँ तो  !

कभी यह भी नहीं होता
किन्हीं चेहरों पर
अब क्या बताऊँ
किसी बुझे चेहरे से !

किस्मत की बुझ
कहीं से भी
ला के दिखाऊँ तो  !

एक विधवा का चेहरा
याद करता हूँ इस वक्त
बुझ किसी विधवा के चेहरे की
ला के दिखाऊँ तो !


Kavita :

वह सेवक वह जैकी
मुझे उसकी आदत नहीं थी
ऐसा ही लगता रहा था
जब भी निकलता था मैं
घर से
वह मर्जी से अपनी
छोड़ आता था मुझे
एक सीमा तक
लेने भी आता था
मैं रहता था
अक्सर मगरूर ही
शान में अपनी
वह पड़ा रहता था
दरवाजे पर
मेरी शान में
वह कुत्ता
वह सेवक
वह जैकी !
कहीं कोई
ऐसा आभास भी नहीं था
उस दिन
उसकी मृत्यु के दिन
वह खाया पिया
अघाया
सोया रहा था सारा दिन
कि अवांछित थोड़ी सी
किसी आवाज़ पर
आसपास की
वह हो जाया करता था
चेतन एकदम से
उस दिन भी
कर्तव्यनिष्ठ हो
वह भागा था
बंदरों के पीछे
फिर वापस नहीं आया था
पहुँच गया था वह
बाघ के मुँह तक
बास लगाते
वह शिकारी
वह जैकी !
अब लगता यही है
वह कहीं से आ जाएगा
नज़र तलाशती है उसे
इसी बीच
याद आती हैं
उसकी अदायें चंचल
उसके देखे गये रूप सब
उनका आभास होता है
उन सब जगहों पर
होते ही दृष्टिपात !
मौत एक कटुतम सच्चाई
इसलिए होती है
कड़वी लगती है
सहने में
किसी प्रिय की !
मृत्यु भी क्या है
भ्रम पैदा करती है
जिस्म मिट जाता है
असली सा कुछ
कहीं तो होता है !
वह जैकी
सदा ही सम था
सब सदस्यों से घर के
वह एक आदर्श सदस्य था घर का
मृत्यु से उसकी
निश्चित ही
सिद्ध यही होता है
एक बड़ा संकट  था
घर पर
जो वीत गया था उस पर
वह सेवक
वह जैकी !
घर तो एक घेरा होता  है
घेरे के बाहर
जैकी सा कोई
अपने आप ही
पहरेदार हो जाता है
जान पर अपनी
खेल जाने की
फितरत होती ही है जिसकी
ऐसा ही था
वह बलिदानी
वह जैकी !
याद में जैकी की
पालना ही है
एक छोटा सा
एक कुत्ता
बिजली पंखे की सुविधाएँ भी
प्रदान की जाएँगी
जिनसे बंचित रहा था जैकी
अपने कुत्ता घर में !

Kavita :

युद्ध करो

यह युद्ध है
लड़ो इसे
बचाव की मुद्रा में
इसका सामना न करो !

वे आत्मघाती हैं
वे युद्ध ही लड़ रहे हैं  !

वे दुस्साहसी हैं
वे युद्ध मोल लिए लड़ रहे हैं
लड़ो इसे !

युद्ध करो !


Kavita :

स्पंदित चेतन सृष्टि के

खूबसूरत चेहरे युवा स्त्रियों के
खिले गुलाबों की मानिंद
स्पंदित चेतन हैं सृष्टि के
वे गुलाब हैं उगे हुए
संस्कारित जो
सलवार कुर्ता ब्रा के संस्कारों से
तुम यह सब नहीं कर सकते
इसलिए तुम सलवार कुर्ता ब्रा पहनी हुई
अपने हिस्से की स्त्री की तुलना
किसी से  नहीं करते
वह अद्वितीय है तुम्हारे लिए !

 


Kavita :

यह सच है
यह जो मंजर है आँखों के सामने का बेमानी है
इस पर एक  कविता लिखी भी नहीं जा सकती
एकदम सोचकर या सोचकर बहुत लंबा चौड़ा
अक्सर देखा हुआ मंजर है यह
और यह भी कि तुम्हें फुर्सत नहीं है
दैनिक व्यस्तताओं के अतिरिक्त की
हो सकता है इस मंजर पर तुम
लिख चुके होओ कविता पहले भी कभी
और ऐसा भी नहीं है
कि दुबारा न लिखी जा सकती हो कविता
किसी भी पुराने मंजर पर दैनिक व्यस्तताओं के चलते भी
देखो इस तरह यह भी एक कविता हो गयी
एक कौंध से लिखी हुई
हृदय के करीब की भाषा में
इसी से अंदाजा लग सकता है
कविता लिखी किस तरह जाती है !


Kavita :

फक्कड़ों की छोटी सी आधी अधूरी दुनिया
एक आदमी था
एक बूढ़ा आदमी भी था
एक बुढ़िया थी
बूढ़ा बुढ़िया दम्पति थे
फिर एक आदमी का जिक्र इसलिए है
कि वे परस्पर के पड़ोसी थे
क्योंकि धरती पर अकेले जिया नहीं जाता
आदमी फक्कड़ था
बस कंडक्टर था
शराबी था
इस तरह वह अकेला ही जिया था
वैसे तो बूढ़ा बुढ़िया भी फक्कड़ थे
बूढ़ा पत्थर तोड़ता था दिन भर दूर जा जाकर
रोजी रोटी के लिए
बुढ़िया भेड़ें चराया करती थी दिन भर
निहायत पालतू किस्म की
या दोनों सूत कातते थे �खाली वक्त में !कुल मिलाकर
एक आदमी था
एक बूढ़ा आदमी भी था
बूढ़ा बुढ़िया दम्पति थे
फिर एक आदमी का जिक्र इसलिए है
कि वे परस्पर के पड़ोसी थे
आदमी फक्कड़ था
बूढ़ा बुढ़िया भी फक्कड़ थे
कुल मिलाकर
वह फक्कड़ों की छोटी सी
आधी अधूरी दुनिया थी !

Kavita :

उम्मीद करूँ बहेगी गंगा  ?

मुझे अफसोस है
कि जो जो दिखते हैं मुझे नुक्श
मेरे आसपास की चीज़ों में
वो न होते कदाचित
अगर मैं उपस्थित होता उस वक़्त
जब गढ़ा जा रहा था चीज़ों को
चौकन्ना तो रहता हूँ मैं
पर नुक्श नहीं जाते
झल्लाता हूँ अपने पर
या हँस जाता हूँ
नासमझी पर लोगों की
गुस्से में दबी एक हँसी !

मंदिर में जैसे
एक गंगा पथ ही था बनाना
कि बहे गंगा शिव की जटाओं से
शिव  लिंग से
सही से शुचितापूर्वक
यह विश्वास लिए
विश्वास भी किया था
मिस्त्री मजदूर पर
समझाया भी था ठीक से
सब निष्फल
देखा जब गंगा पथ
बना हुआ तैयार
बहाने को गंगा
सब उल्टा
ऐसे के सलाहकार भी रहे होंगे निश्चित
अब जब
कोई भी बहाता है गंगा
गंगा नहीं बहती  !

यह तो वैसा ही है
जैसे कि हम जाते हैं घर से
प्रेम की गंगा बहाते
साझा करते हुए खुशी
साझा करने के ख्याल से
कि साथ वाले विश्वस्त
ईर्ष्या में भरे जाते हैं
सारा मजा ही किरकिरा किये देते हैं
इसमें क्या फर्क
कि साथ वाले विश्वस्तों ने मूड खराब किया
या मंदिर में  मिस्त्री ने दोष गढ़ा
ऐसे ही होते हैं लोग
गंगा नहीं बहती
उम्मीद करूँ बहेगी गंगा  ?


Kavita :

अमलतास

सेहरे निकल आये हैं अमलतास   के
पेड़ों में एक पेड़ अमलतास खास के
पीले फूलों से ढके मुँह अमलतास के
कितने चेहरे देखना ही पड़ेगा पास से
दूल्हे को सजाने के पहले अहसास से
धन्य हुए हैं पीले फूल अमलतास के
दूल्हे न ऋणी  गुलाब के न पलाश के
वे ऋणी हैं सदियों से अमलतास के !


Kavita :

मेरा समय

मेरे सापेक्ष की
पुरानी पड़ती चीज़ों की दुनिया
मेरा समय है
मेरी दुनिया छोटी सी है
जो मेरे लिए नहीं है अदृश्य !

यह संसार
समस्त लोगों की
छोटी छोटी दुनियाओं से निर्मित है
जिसमें पृथ्वी है और सूर्य है
और समस्त लोगों के समय के लिए
पृथ्वी चक्कर लगाती है सूर्य के
जो अदृश्य है सबके लिए
मेरे लिए भी !


Kavita :

हमारी जगहें

देशांतर रेखाएँ निश्चित करती हैं हमारी जगहें
एक आक्षांश रेखा  पर
कि हम पूर्वी गोलार्द्ध में होकर भी
हमारी जगहें पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई हैं
हम एक ही आक्षांश रेखा पर सोते जागते हैं
हम वहीं घूमते हैं अपने अपने बिंदुओं पर
पृथ्वी जब घूमती है
हम सूर्य की गति समझते हैं
समय के विस्तार में देश है
हमारा एक देश है
परस्पर का हमारा प्रेम है !

आक्षांश रेखा का विस्तार
दूसरी आक्षांश रेखाओं को समेटे हुए है
इतना बड़ा देश है
हमारा एक देश है
परस्पर का हमारा प्रेम है !


Kavita :

बड़ी उम्र में

बड़ी उम्र में बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है कंधों पर
जिसके लिए तुम्हें प्रोत्साहित किया भी नहीं गया होता है कभी भी
तुम बड़े ओहदे पर जा सकते हो बड़ी उम्र में
घर के मुखिया हो सकते हो
और हो सकता है बड़े कवि भी हो जाओ
जिस्मानी तौर पर तुम इन जिम्मेदारियों को उठा सको
इसमें तुम्हें भी संदेह हो सकता है
अभी तुम्हें खरा जो उतरना होता है इनके लिए
तुम्हारा अनुभव काम की चीज हो सकती है तुम्हारे लिए
बड़े ओहदे पर होकर मुखिया होना
जैसे तैसे निभ भी सकता है
पर बड़े  कवि तो तुम हो नहीं सकते
मृत्यु के बाद हो सको तो शायद !


Kavita :

माँ को मेरा पूरा जीवन याद है

शिशु जब रहा था मैं
छोटा सा
फिर उससे थोड़ा बड़ा
उससे भी थोड़ा और बड़ा
बचपन मेरे का आरंभ हुआ था जब
शैशवास्था का तो कुछ याद नहीं मुझे
हाँ बचपन भी धुंधला धुंधला याद है
जिसका एकाध सूत्र याद करता हूँ जब भी
माँ के सामने
माँ के चेहरे पर फैल जाता है
मीठा एक भाव
जो टपक पड़ता है माँ के बोलों में
सुनाने में मेरा बचपन
जैसे मैं दुनिया का
सबसे समझदार बच्चा रहा हूँगा
या हूँ
माँ को तो बचपन ही क्या
अब तक का जिया
मेरा सारा जीवन याद है
मेरे सारे दुख सुख
इसलिए कि
मैं माँ के साथ हूँ
माँ मेरे पास है !

वो ही अपनापन अब भी
बचपन सा
वही महक दूध की
गरने के फूलों सी
अम्मा ने तो क्या बदलना
मैं नहीं बदला
वही ममता माँ की
वही मेरा प्रेम
और भी जुड़े जज्ब हुए
इस मम�ता और प्रेम में
रहता भले ही हूँ
पास ही के घर में
खाता अब भी हूँ
माँ के हाथ का बना
मनपसंद
जो जुड़े जज्ब हुए
जैसे कैसे भी
आभारी हूँ उनका
माँ तो जोड़ती ही है
अब कह सकता हूँ
माँ जोड़े रखती है !


Kavita :

जिंदगी

जिंदगी लम्हा लम्हा
और लम्हा भी इस तरह
कि सशर्त जिओ इसे
और मर भी सकते तो मर भी जाओ !

जिंदगी धोखा धोखा
और धोखा भी इस तरह
कि सशर्त जिओ इसके लिए
और मर भी सकते तो मर भी जाओ !

जिंदगी एक उलझी चाल
समझ सकते तो समझते जाओ
एक दिन समझ आता ही
जानते जानते मर भी सकते
और मर भी सकते तो मर भी जाओ !

इस तरह तो चाहिए
मज़बूत मन जीने के लिए !


Kavita :

इस संधि समय में

इस संधि समय में
मैं खड़ा हूँ क्षितिजों से घिरा
देखता हूँ यह जंगल
करौंधे नये हुए जा रहे हैं �इनके पत्तों से
इसलिए यह जंगल बचा हुआ है !

हरी हरी घास भी बिछने लगी है सज कर
जानी पहचानी नवयौवना एक
सुंदर लिबास में
चाँद सा चेहरा लेकर
उपस्थित हो
यही याद तरोताजा हुई जाती है अब !

चाँदनी का उजास
अभी अभी फैल गया है हृदय के आकाश में
उसी की याद की एक बानगी भर है यह !

याद के संग ही बैठना होगा अब
हरी हरी इस घास पर !


Kavita :

कुछ भी न सोचने से निवृत्त होते हुए

कच्छा वनियान पहने हुए वह आदमी
जो टहलता है छत पर कुछ भी न सोचते हुए
चाँद देख सकता है आसमान पर का
पर पूरे तारे गिनने की तो वह सोच भी नहीं सकता
फिर भी वह अलग है उस आदमी से
जिसके पास सोच नहीं है
हलाँकि वह भी उस वक्त सोच नहीं रहा होता है
पर टहल ही रहा होता है
और जिसके पास सोच नहीं होती है
वह टहलता भी कहाँ है छत पर !

सोच का आदमी धीरेधीरे उतरता है सीढ़ियाँ छत से
सोचते हुए कि खलल न पड़ता हो पत्नी की नींद में
महसूसते हुए
पत्नी तो अक्सर करती है ऐसा ही मूक प्रेम
दोपहर की नींद के वक्त
खुद काम में मशरूफ रहते हुए
ओढ़ने की चादर को हल्के  से सीधा करते हुए
इस तरह सोचता है छत पर टहल कर आता हुआ आदमी
कुछ भी न सोचने से निवृत्त होते हुए !


Kavita :

अब हम वे विरवे भी नहीं

थकान हो जाती है
गर्मियाँ हैं
और सफर भी  ऊपर से
नौकरियां होती भी कहाँ है घर पर !

पेड़ पौधे भी नहीं हम
कि एक ही जगह खड़े खड़े
प्राप्त करते रहें अपना भोग्य !

अब हम वे विरवे भी नहीं
भिंडी के टमाटर के
जिन्हें पिता पाल रहे हैं
क्यारियों में इन दिनों !


Kavita :

स्त्री

स्त्री एक खूबसूरत रचना है
यह और भी खूबसूरत हुई होती है
इसकी परवरिश से
इसका  संतुलित आचार व्यवहार
सलीका इसका
देखते ही बनता है
�एक  स्त्री को
���उस तरह ही देखते हैं हम
जिस तरह एक बड़े व्यक्ति को देखते है
श्रद्धा पूर्वक
उसका बोलचाल
उसका हंसना मुस्कुराना
सब देखने की चीजें  हैं
सुंदरता मुखर मुखर हुई जाती है
एक स्त्री खूबसूरत रचना यूं होती है !


Kavita :

वहाँ पहाड़ पर

**

जिंदगी ही निकालनी हैं
यह कैसे भी निकल जाती है
जैसे पहाड़ पर
जहाँ सीमित हैं साधन
न कोई चकाचौंध
न ज्यादा हलचल
वहीं ही बहलना होता है
हवाओं से
पंछियों से
अपने पशुओं से
भेड़ बकरियों से !

वहाँ पहाड़ पर
जीने  की ही तरकीबें
सोचनी पड़ती हैं
इसके अलावा
कोई नखरा भी नहीं
कोई नाज भी नहीं
केवल मासूमियत ही
पहने रहनी पड़ती है !

और क्या कहने
युवतियाँ के
सुंदर चेहरों की मासूमियत के
उन पर शायद ही कोई
जुल्म करता हो कभी !

क्या ही मासूम होता है
पहाड़ पर का दांपत्य जीवन !


Kavita :

वे स्कूल के दिन

***

वे स्कूल के दिन
वे दिन थे
पढ़ने लिखने के
खेलने के
कि काँचों के खेल में
झगड़ा भी
हो जाता था
कभीकभी  !

पूरी तरह से
भूलते भी नहीं हैं
वे दिन
याद आते ही
वे दिन लड़कपन के
मन हो जाता है
बचपन का सा
मलाल लेशमात्र भी नहीं
झगडों का
शरारतों का
मुस्कुरा भर जाता है मन !

झगड़ा कभी
इतना भी बढ़ जाता था
कि मित्र
मित्र के पक्ष में
खड़ा हो जाता था
और प्रदर्शन हो जाता था
उन्हीं क्षमताओं का
अक्ल का
और बल का
आज भी डटे हैं
जीवन में उन्हीं से
इसी के लिए तो
स्कूल ने
तैयार किया था हमको !

और कुछ थे
जो कम उम्र लेकर आये थे
ईश्वर ने
बनाया ही
कम दिनों के लिए था उनको
वे खेल के साथी थे
उन्हें याद कर लेता है
कभीकभी मन  !


Kavita :

उनकी हँसी

ठीक यहीं से
अग�र मैं मान लूँ
मेरे जीवन का अंत
जब बहुत कह चुका हूँ
धरे का धरा रह जाएगा
कहा हुआ सब
ऐसा लगेगा
कि कहना ही कहना हु�आ
जो सुना ही सुना गया
एक वहम भी हो सकता है
सुना जाने का !

हँसेंगे लोग
(जो अब भी हँस जाते हैं
कैसे ये लोग हैं ! )
कि कहता ही था
कहकर
कर भी क्या लिया
हँसेंगे
मंद मंद मुस्कुराएंगे भी
यूँ ही बनाता रहा बातें
दुनिया तो
यूँ ही चलेगी
बीच में
यूं ही खटका पैदा करता था
दुनिया कौन बदल सका है ?

पर उन्हें
शायद यह नहीं मालूम
कि दुनिया भले ही
न बदलती हो
व्यवस्था जब बदलती है
तो जीना बदल जाता है
दुनिया का !

पर हम जैसे लोग
जो तल बल
नहीं अपनाते कुछ भी
सीधा सीधा सच पर रहते हैं
वे भी तो जीते ही हैं !

मसलन
मेरे एक दोस्त ने कहा था
मुझसे एक बार
अगर मैं
पढ़ लिख न सका होता
तो मैं खेतीबारी तो
कर ही रहा होता
हल तो
मैं आज भी चलाता हूँ
फसलें भी काटता हूँ
मैं मेरी पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ
आज भी हूँ
और जो पुराना जमाना होता
राजाओं का
कशाघात सहता
चौराहों पर
और शहीद हो जाता
तब भी
हँसने वाले हँसते ही !

पर सच बोलने वाला
करे भी तो क्या करे
उससे रहा नहीं जाता
पत्थर बन
जी नहीं सकता वह
हश्र जो होता हो
होता रहे
हँसते रहें चाहे लोग उस पर !

भले ही
उनकी हँसी
भयाक्रान्त कर देती हो
मुर्दा लोग ही कर सकते हैं ऐसा
किसी के
मुर्दा हो जाने पर जो
जरूर ही हँस सकते हैं !


Kavita :

सफर

दिन का सफर भी क्या
कि अभी गुजरो
ये जो दिखते पहाड़ हैं
यह जो नदिया बहती है
उड़ती चिड़िया जो कहती है
सब छूट जाता है अभी !

रात का सफर भी क्या है
कि खूबसूरत एक स्त्री हुई
उसे ईर्ष्या हु�ई मुझसे
मैं क्यों इतना सुंदर ख्याल
और सोती भी रही मेरी बगल में
उनींदी
बस में
सफर में !


Kavita :

एक लड़के से

**

मैं कह रहा था
एक लड़के से
जैसा है
वैसा ही कुबूल लेना
यह नियति नहीं हमारी
यही तो मान कर
चलते आ रहे हम
कब से !

पर इतना
आसान भी नहीं है
इस नियति को बदलना
कि अवधारणायें
इतनी अस्पष्ट
और विकृत भी
कि लोग
समझते नहीं हैं साजिशें !

लड़के ने कहा था
जब सब पढ़ जाएँगे
समझ जाएँगे लोग
मैंने कहा था
तब तक तो
और भी
अनपढ़ आ जाएँगे
नियति तो हमारी है
और हमें ही
बदलना चाहिए इसे !


Kavita :

यह समय

यह समय है
कि गाय की हत्या रोकने की बात हो रही है
फिर तो किसी भी आदमी को
इस समय आदमी के प्रति भी
संवेदनशील होने की जरूरत हो रही है
माना कि सभ्य समाज की आधारशिला रखी जा रही है
रामराज्य की स्थापना की ओर अग्रसर हो रहे हों
धर्म बढ़ाया जा रहा हो इस तरह
फिर  हत्या आदमी की क्यों हो रही है ?

धर्म अति का धर्म नहीं
पाखंड होता है
रूढ़ी होता है
धर्मान्धता होता है !

माना कि बंदिशें अच्छी होती हैं
पर बंदिशों पर भी बंदिशें हों
तो और भी अच्छा होता है !

रामराज्य लौटे इससे पहले
हर किसान के घर में गाय पले
इतना नैतिक तो हो हिंदू
नैतिकता पढ़ाने से पहले
खेतिहरों को
खेतीबाड़ी करने के लिए प्रेरित करना होगा
किसान को बनाना ही होगा किसान
यह संभव भी है !

इतना ही रहे धर्म
इससे पहले राजनीति सुधरनी है देश की
व्यवस्थाएं बदलनी है देश की
ईमान आये राजनीति में
फिर ईमान आयेगा प्रजा में भी
इसके लिए यह कतई जरूरी नहीं
कि सबको हिन्दू होना ही होगा
इतना भर करना होगा
रामराज्य अगर स्थापित करना होगा !


Kavita :

समझ

**

जो डरता है
वो काम करता नहीं
और जो वह करता है
उसे  लगता है
उसे तो समझ है
उसी का तो वह
करता है इस्तेमाल
उसकी नज़र में
वेबकूफ हैं वह
जो उसकी तरह
समझ का
करता नहीं  इस्तेमाल !

समझ का क्या
खिला पिला कर
कोई भी
मित्र हो जाता है
काम भी कोई भी
जिससे कभी भी
निकल जाता है
वह भी तब
जब वह खुद भी
खाता पीता है
इसी चीज़ का
कभीकभी
गुमान भी
हो जाता है उसे !

और सुबह
जब वही आदमी
गीत गुनगुनाता
मिलता है कुर्सी पर
हम जैसे
पूछ बैठते हैं
क्या बात है
बड़े खुश
नज़र आते हो मित्र ?
हमारा मतलब
खुश होना ही चाहिए मित्र को
और वह
सोच में डूबते हुए
चुप हो जाता है
उदास हो जाता है !


Kavita :

एकतरफा प्रेम

***

हाल ही में
स्कूल कर चुकी
लड़की का नाम
लिखा रखा है
उत्खनित
दीवार पर
असल में
लिख रखा है जिसे
किसी एक लड़के ने
अपने हृदय पर
ताउम्र के लिए
छाप छवि की
सुंदर लड़की की
पड़ चुकी
अब तो !

मैं यह नहीं कहता
यह ठीक है
या गलत है
होगा ठीक
या गलत
अपने अपने
समय पर
पर अच्छा है
लड़की सुंदर है
मासूम है
उसे तो अब
पता नहीं
कहाँ निकल जाना है
पढ़ने के लिए !

और जो लड़का है
कोई भी
वह तो
एकतरफा ही
करता रहेगा प्रेम !

अभिसरण
हो ही चुका
अब तो
कि दिखेगी
वह लड़की
अब तो
ख्वाबों में ही !

पढ़ेगा तो
वह लड़का भी
छवि दिल में लिए
ऊर्जा प्रदान
करती रहेगी
उसे वह
उस सी ढ़ूँढता भी फिरेगा !

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