0218 – Vikram Gathania

Kavita :

हमारी जगहें

देशांतर रेखाएँ निश्चित करती हैं हमारी जगहें
एक आक्षांश रेखा  पर
कि हम पूर्वी गोलार्द्ध में होकर भी
हमारी जगहें पूर्व से पश्चिम तक फैली हुई हैं
हम एक ही आक्षांश रेखा पर सोते जागते हैं
हम वहीं घूमते हैं अपने अपने बिंदुओं पर
पृथ्वी जब घूमती है
हम सूर्य की गति समझते हैं
समय के विस्तार में देश है
हमारा एक देश है
परस्पर का हमारा प्रेम है !

आक्षांश रेखा का विस्तार
दूसरी आक्षांश रेखाओं को समेटे हुए है
इतना बड़ा देश है
हमारा एक देश है
परस्पर का हमारा प्रेम है !


Kavita :

बड़ी उम्र में

बड़ी उम्र में बड़ी जिम्मेदारी आ जाती है कंधों पर
जिसके लिए तुम्हें प्रोत्साहित किया भी नहीं गया होता है कभी भी
तुम बड़े ओहदे पर जा सकते हो बड़ी उम्र में
घर के मुखिया हो सकते हो
और हो सकता है बड़े कवि भी हो जाओ
जिस्मानी तौर पर तुम इन जिम्मेदारियों को उठा सको
इसमें तुम्हें भी संदेह हो सकता है
अभी तुम्हें खरा जो उतरना होता है इनके लिए
तुम्हारा अनुभव काम की चीज हो सकती है तुम्हारे लिए
बड़े ओहदे पर होकर मुखिया होना
जैसे तैसे निभ भी सकता है
पर बड़े  कवि तो तुम हो नहीं सकते
मृत्यु के बाद हो सको तो शायद !


Kavita :

माँ को मेरा पूरा जीवन याद है

शिशु जब रहा था मैं
छोटा सा
फिर उससे थोड़ा बड़ा
उससे भी थोड़ा और बड़ा
बचपन मेरे का आरंभ हुआ था जब
शैशवास्था का तो कुछ याद नहीं मुझे
हाँ बचपन भी धुंधला धुंधला याद है
जिसका एकाध सूत्र याद करता हूँ जब भी
माँ के सामने
माँ के चेहरे पर फैल जाता है
मीठा एक भाव
जो टपक पड़ता है माँ के बोलों में
सुनाने में मेरा बचपन
जैसे मैं दुनिया का
सबसे समझदार बच्चा रहा हूँगा
या हूँ
माँ को तो बचपन ही क्या
अब तक का जिया
मेरा सारा जीवन याद है
मेरे सारे दुख सुख
इसलिए कि
मैं माँ के साथ हूँ
माँ मेरे पास है !

वो ही अपनापन अब भी
बचपन सा
वही महक दूध की
गरने के फूलों सी
अम्मा ने तो क्या बदलना
मैं नहीं बदला
वही ममता माँ की
वही मेरा प्रेम
और भी जुड़े जज्ब हुए
इस मम�ता और प्रेम में
रहता भले ही हूँ
पास ही के घर में
खाता अब भी हूँ
माँ के हाथ का बना
मनपसंद
जो जुड़े जज्ब हुए
जैसे कैसे भी
आभारी हूँ उनका
माँ तो जोड़ती ही है
अब कह सकता हूँ
माँ जोड़े रखती है !


Kavita :

जिंदगी

जिंदगी लम्हा लम्हा
और लम्हा भी इस तरह
कि सशर्त जिओ इसे
और मर भी सकते तो मर भी जाओ !

जिंदगी धोखा धोखा
और धोखा भी इस तरह
कि सशर्त जिओ इसके लिए
और मर भी सकते तो मर भी जाओ !

जिंदगी एक उलझी चाल
समझ सकते तो समझते जाओ
एक दिन समझ आता ही
जानते जानते मर भी सकते
और मर भी सकते तो मर भी जाओ !

इस तरह तो चाहिए
मज़बूत मन जीने के लिए !


Kavita :

इस संधि समय में

इस संधि समय में
मैं खड़ा हूँ क्षितिजों से घिरा
देखता हूँ यह जंगल
करौंधे नये हुए जा रहे हैं �इनके पत्तों से
इसलिए यह जंगल बचा हुआ है !

हरी हरी घास भी बिछने लगी है सज कर
जानी पहचानी नवयौवना एक
सुंदर लिबास में
चाँद सा चेहरा लेकर
उपस्थित हो
यही याद तरोताजा हुई जाती है अब !

चाँदनी का उजास
अभी अभी फैल गया है हृदय के आकाश में
उसी की याद की एक बानगी भर है यह !

याद के संग ही बैठना होगा अब
हरी हरी इस घास पर !


Kavita :

कुछ भी न सोचने से निवृत्त होते हुए

कच्छा वनियान पहने हुए वह आदमी
जो टहलता है छत पर कुछ भी न सोचते हुए
चाँद देख सकता है आसमान पर का
पर पूरे तारे गिनने की तो वह सोच भी नहीं सकता
फिर भी वह अलग है उस आदमी से
जिसके पास सोच नहीं है
हलाँकि वह भी उस वक्त सोच नहीं रहा होता है
पर टहल ही रहा होता है
और जिसके पास सोच नहीं होती है
वह टहलता भी कहाँ है छत पर !

सोच का आदमी धीरेधीरे उतरता है सीढ़ियाँ छत से
सोचते हुए कि खलल न पड़ता हो पत्नी की नींद में
महसूसते हुए
पत्नी तो अक्सर करती है ऐसा ही मूक प्रेम
दोपहर की नींद के वक्त
खुद काम में मशरूफ रहते हुए
ओढ़ने की चादर को हल्के  से सीधा करते हुए
इस तरह सोचता है छत पर टहल कर आता हुआ आदमी
कुछ भी न सोचने से निवृत्त होते हुए !


Kavita :

अब हम वे विरवे भी नहीं

थकान हो जाती है
गर्मियाँ हैं
और सफर भी  ऊपर से
नौकरियां होती भी कहाँ है घर पर !

पेड़ पौधे भी नहीं हम
कि एक ही जगह खड़े खड़े
प्राप्त करते रहें अपना भोग्य !

अब हम वे विरवे भी नहीं
भिंडी के टमाटर के
जिन्हें पिता पाल रहे हैं
क्यारियों में इन दिनों !


Kavita :

स्त्री

स्त्री एक खूबसूरत रचना है
यह और भी खूबसूरत हुई होती है
इसकी परवरिश से
इसका  संतुलित आचार व्यवहार
सलीका इसका
देखते ही बनता है
�एक  स्त्री को
���उस तरह ही देखते हैं हम
जिस तरह एक बड़े व्यक्ति को देखते है
श्रद्धा पूर्वक
उसका बोलचाल
उसका हंसना मुस्कुराना
सब देखने की चीजें  हैं
सुंदरता मुखर मुखर हुई जाती है
एक स्त्री खूबसूरत रचना यूं होती है !


Kavita :

वहाँ पहाड़ पर

**

जिंदगी ही निकालनी हैं
यह कैसे भी निकल जाती है
जैसे पहाड़ पर
जहाँ सीमित हैं साधन
न कोई चकाचौंध
न ज्यादा हलचल
वहीं ही बहलना होता है
हवाओं से
पंछियों से
अपने पशुओं से
भेड़ बकरियों से !

वहाँ पहाड़ पर
जीने  की ही तरकीबें
सोचनी पड़ती हैं
इसके अलावा
कोई नखरा भी नहीं
कोई नाज भी नहीं
केवल मासूमियत ही
पहने रहनी पड़ती है !

और क्या कहने
युवतियाँ के
सुंदर चेहरों की मासूमियत के
उन पर शायद ही कोई
जुल्म करता हो कभी !

क्या ही मासूम होता है
पहाड़ पर का दांपत्य जीवन !


Kavita :

वे स्कूल के दिन

***

वे स्कूल के दिन
वे दिन थे
पढ़ने लिखने के
खेलने के
कि काँचों के खेल में
झगड़ा भी
हो जाता था
कभीकभी  !

पूरी तरह से
भूलते भी नहीं हैं
वे दिन
याद आते ही
वे दिन लड़कपन के
मन हो जाता है
बचपन का सा
मलाल लेशमात्र भी नहीं
झगडों का
शरारतों का
मुस्कुरा भर जाता है मन !

झगड़ा कभी
इतना भी बढ़ जाता था
कि मित्र
मित्र के पक्ष में
खड़ा हो जाता था
और प्रदर्शन हो जाता था
उन्हीं क्षमताओं का
अक्ल का
और बल का
आज भी डटे हैं
जीवन में उन्हीं से
इसी के लिए तो
स्कूल ने
तैयार किया था हमको !

और कुछ थे
जो कम उम्र लेकर आये थे
ईश्वर ने
बनाया ही
कम दिनों के लिए था उनको
वे खेल के साथी थे
उन्हें याद कर लेता है
कभीकभी मन  !


Kavita :

उनकी हँसी

ठीक यहीं से
अग�र मैं मान लूँ
मेरे जीवन का अंत
जब बहुत कह चुका हूँ
धरे का धरा रह जाएगा
कहा हुआ सब
ऐसा लगेगा
कि कहना ही कहना हु�आ
जो सुना ही सुना गया
एक वहम भी हो सकता है
सुना जाने का !

हँसेंगे लोग
(जो अब भी हँस जाते हैं
कैसे ये लोग हैं ! )
कि कहता ही था
कहकर
कर भी क्या लिया
हँसेंगे
मंद मंद मुस्कुराएंगे भी
यूँ ही बनाता रहा बातें
दुनिया तो
यूँ ही चलेगी
बीच में
यूं ही खटका पैदा करता था
दुनिया कौन बदल सका है ?

पर उन्हें
शायद यह नहीं मालूम
कि दुनिया भले ही
न बदलती हो
व्यवस्था जब बदलती है
तो जीना बदल जाता है
दुनिया का !

पर हम जैसे लोग
जो तल बल
नहीं अपनाते कुछ भी
सीधा सीधा सच पर रहते हैं
वे भी तो जीते ही हैं !

मसलन
मेरे एक दोस्त ने कहा था
मुझसे एक बार
अगर मैं
पढ़ लिख न सका होता
तो मैं खेतीबारी तो
कर ही रहा होता
हल तो
मैं आज भी चलाता हूँ
फसलें भी काटता हूँ
मैं मेरी पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ
आज भी हूँ
और जो पुराना जमाना होता
राजाओं का
कशाघात सहता
चौराहों पर
और शहीद हो जाता
तब भी
हँसने वाले हँसते ही !

पर सच बोलने वाला
करे भी तो क्या करे
उससे रहा नहीं जाता
पत्थर बन
जी नहीं सकता वह
हश्र जो होता हो
होता रहे
हँसते रहें चाहे लोग उस पर !

भले ही
उनकी हँसी
भयाक्रान्त कर देती हो
मुर्दा लोग ही कर सकते हैं ऐसा
किसी के
मुर्दा हो जाने पर जो
जरूर ही हँस सकते हैं !


Kavita :

सफर

दिन का सफर भी क्या
कि अभी गुजरो
ये जो दिखते पहाड़ हैं
यह जो नदिया बहती है
उड़ती चिड़िया जो कहती है
सब छूट जाता है अभी !

रात का सफर भी क्या है
कि खूबसूरत एक स्त्री हुई
उसे ईर्ष्या हु�ई मुझसे
मैं क्यों इतना सुंदर ख्याल
और सोती भी रही मेरी बगल में
उनींदी
बस में
सफर में !


Kavita :

एक लड़के से

**

मैं कह रहा था
एक लड़के से
जैसा है
वैसा ही कुबूल लेना
यह नियति नहीं हमारी
यही तो मान कर
चलते आ रहे हम
कब से !

पर इतना
आसान भी नहीं है
इस नियति को बदलना
कि अवधारणायें
इतनी अस्पष्ट
और विकृत भी
कि लोग
समझते नहीं हैं साजिशें !

लड़के ने कहा था
जब सब पढ़ जाएँगे
समझ जाएँगे लोग
मैंने कहा था
तब तक तो
और भी
अनपढ़ आ जाएँगे
नियति तो हमारी है
और हमें ही
बदलना चाहिए इसे !


Kavita :

यह समय

यह समय है
कि गाय की हत्या रोकने की बात हो रही है
फिर तो किसी भी आदमी को
इस समय आदमी के प्रति भी
संवेदनशील होने की जरूरत हो रही है
माना कि सभ्य समाज की आधारशिला रखी जा रही है
रामराज्य की स्थापना की ओर अग्रसर हो रहे हों
धर्म बढ़ाया जा रहा हो इस तरह
फिर  हत्या आदमी की क्यों हो रही है ?

धर्म अति का धर्म नहीं
पाखंड होता है
रूढ़ी होता है
धर्मान्धता होता है !

माना कि बंदिशें अच्छी होती हैं
पर बंदिशों पर भी बंदिशें हों
तो और भी अच्छा होता है !

रामराज्य लौटे इससे पहले
हर किसान के घर में गाय पले
इतना नैतिक तो हो हिंदू
नैतिकता पढ़ाने से पहले
खेतिहरों को
खेतीबाड़ी करने के लिए प्रेरित करना होगा
किसान को बनाना ही होगा किसान
यह संभव भी है !

इतना ही रहे धर्म
इससे पहले राजनीति सुधरनी है देश की
व्यवस्थाएं बदलनी है देश की
ईमान आये राजनीति में
फिर ईमान आयेगा प्रजा में भी
इसके लिए यह कतई जरूरी नहीं
कि सबको हिन्दू होना ही होगा
इतना भर करना होगा
रामराज्य अगर स्थापित करना होगा !


Kavita :

समझ

**

जो डरता है
वो काम करता नहीं
और जो वह करता है
उसे  लगता है
उसे तो समझ है
उसी का तो वह
करता है इस्तेमाल
उसकी नज़र में
वेबकूफ हैं वह
जो उसकी तरह
समझ का
करता नहीं  इस्तेमाल !

समझ का क्या
खिला पिला कर
कोई भी
मित्र हो जाता है
काम भी कोई भी
जिससे कभी भी
निकल जाता है
वह भी तब
जब वह खुद भी
खाता पीता है
इसी चीज़ का
कभीकभी
गुमान भी
हो जाता है उसे !

और सुबह
जब वही आदमी
गीत गुनगुनाता
मिलता है कुर्सी पर
हम जैसे
पूछ बैठते हैं
क्या बात है
बड़े खुश
नज़र आते हो मित्र ?
हमारा मतलब
खुश होना ही चाहिए मित्र को
और वह
सोच में डूबते हुए
चुप हो जाता है
उदास हो जाता है !


Kavita :

एकतरफा प्रेम

***

हाल ही में
स्कूल कर चुकी
लड़की का नाम
लिखा रखा है
उत्खनित
दीवार पर
असल में
लिख रखा है जिसे
किसी एक लड़के ने
अपने हृदय पर
ताउम्र के लिए
छाप छवि की
सुंदर लड़की की
पड़ चुकी
अब तो !

मैं यह नहीं कहता
यह ठीक है
या गलत है
होगा ठीक
या गलत
अपने अपने
समय पर
पर अच्छा है
लड़की सुंदर है
मासूम है
उसे तो अब
पता नहीं
कहाँ निकल जाना है
पढ़ने के लिए !

और जो लड़का है
कोई भी
वह तो
एकतरफा ही
करता रहेगा प्रेम !

अभिसरण
हो ही चुका
अब तो
कि दिखेगी
वह लड़की
अब तो
ख्वाबों में ही !

पढ़ेगा तो
वह लड़का भी
छवि दिल में लिए
ऊर्जा प्रदान
करती रहेगी
उसे वह
उस सी ढ़ूँढता भी फिरेगा !

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