#Pratiyogita Kahani 18 by Arun Kumar Arya

दादा पोती पोते
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ये कहानी झूठी है ,झूठी है, झूठी है। जब यह बात पिंकू ने बोला तो दादा जी ने कहा अरे भाई कहानी तो कहानी है, झूठी हो या सच्ची हो,इसका नाम ही कहानी है।इसको सुनने में तुम्हें क्या हानि है ? लेकिन अपनी बात को दोहराते हुए पोता जिद्द कर ही बैठा कि हमको दूसरी कहानी सुनाइये।उसके अड़ जाने पर दादा जी ने कहा कि चलो यार तुम तो कभी कहोगे कि राजा- रानी की कहानी सुनाइये, कभी कहोगे कि परी की कहानी सुनाइये, कभी कहोगे कि शेर,भालू की कहानी सुनाइये।अच्छा अब जाओ मुझे आराम करने दो।लेकिन पोता मानने को कहाँ तैयार। वह दादा से कहानी सुनने की जिद्द करने ही लगा जिस पर दादा जी ने कहा-कि आने दो तुम्हारे पापा को उनसे तुम्हारी शिकायत करता हूँ। इतना कहना ही था कि उसके पापा आ धमके।उन्हें दादा पोते के बहस की कुछ भनक सी लगी तो उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि बाबू जी से वो सब क्या शरारत कर रहे हैं ? पति की बात सुनकर पिंकू की मम्मी ने कहा कि आप चुपचाप बैठिए।यह दादा पोती पोते का रोज का किस्सा है।ना उन सबके बिना उनको चैन है,ना उनके बिना उन सबको।
दादा जी एक माने जाने चिकित्सक थे।प्रैक्टिस भी उनकी खूब चलती थी,लोग उनका खूब सम्मान करते थे, जब रात को वे घर आते थे तो पहले अपने पोती पोते को अपनी आँखों से एक नजर देख लेना चाहते थे।उनके लिए कुछ न कुछ खाने की चीज अवश्य लाते थे, अगर किसी दिन नहीं लाए तो अपने पोती पोते से मँगवा कर आपस में बैठ मिल सब खाते थे।बच्चे उनसे हिले मिले थे।वे आपस में चाहे कितना भी लड़ते भिड़ते रहे लेकिन जब दादा जी एक को कुछ देते थे तो वे दूसरे के लिए जरुर डिमांड कर देते रहे।यह सिलसिला रोज का था।दादी की मृत्यु हो चुकी थी।वे बहुत ही सुलझी हुई महिला थी।बच्चे दिन भर उनको पकड़े रहते थे।उनके मम्मी को तो सास के रहते हुए यह भी पता नहीं चला कि बच्चों को कैसे पाला जाता है ? वे उन्हें साफ सुथरा करके दूध पिलाकर उनके पास छोड़ देती थी।जब तक वह काम में लगी रहती थीं, बच्चे अपनी दादी के पास ही रहते ,खेलते -खाते थे।काम से फुर्सत मिलने के पश्चात् ही वे बच्चों को हाथ लगाती थीं।
दादी के गुजर जाने के बाद बच्चे दादा के पास बैठकर उनसे बातें करते थे।जैसे वे दादा को
खिलौना समझ कर उनसे खूब खेलते थे ।दादा जी का भी मन उन सबसे लगा रहता था।उनके बेटे के पास के उनसे बात करने का समय ही नहीं मिलता था। जब नौकरी से फुर्सत मिले तब ना उनके पास बैठे,ऐसा अवसर छुट्टी के दिन ही मिलता था,तब बाप बेटे बैठकर किसी समस्या पर वार्तालाप करते थे।यह घर नहीं स्वर्ग था ,जिससे अन्य लोग प्रेरणा लेते थे।जब कभी दादा जी बच्चों से बिस्कुट,नमकीन कुछ माँगते थे तो उनकी मम्मी पूरा डिब्बा ही भेज देती थीं।दादा,पोते-पोती सब मिलकर खाते थे।कभी दादा जी को कुछ विशेष चीज खाने की आवश्यकता होती थी तो बच्चों से कहते थे कि जाओ मम्मी से पूछो कि उसे बनायेंगी।स्वीकृति मिलने पर तुरंत दादा जी सामान मँगाते थे,जो कुछ बनता था,सभी लोग मिलकर खाते थे।जब रात में दादा और पोते पोती फुर्सत में होते थे तो बैठकर बात चीत करते थे ,उनमें बहसी बहसा भी होता था।कहानी किस्से भी होते थे। आज पोता चिड़िया चुनमुन का किस्सा सुनने की जिद्द कर बैठा।जिस पर दादा ने कहा कि तुम तो तुरन्त कह दोगे कि कहानी झूठी है।जब पोते ने कहा कि आप सुनाइये मैं कुछ नहीं बोलूँगा।दादा ने सुनाना शुरु किया- -देखो चुनमुन तुम लोग हो, अब चिड़िया की कहानी सुनो-एक जंगल में बहुत से पशु,पक्षी और खतरनाक जानवर रहते थे।एक बार उस जंगल में आग लग गयी ,उनका इतना कहना था कि पोते ने प्रश्न दाग ही दिया।दादा जी कैसे आग लग गयी थी ? पोते के इस प्रश्न पर दादा जी ने कहानी कहना बन्द कर दिया।बच्चे कहाँ मानने वाले, वे पूछ ही बैठे कि दादा जी कहानी कहना क्यों बन्द कर दिए।सुनाइये ना।दादा जी चुप तो चुप, काहे को बोले।बच्चे लगे शोर मचाने कि नहीं हमें कहानी सुनाइये।क्या सुनाए यार मैनें पहले ही कहा था कि -देखो बीच में तुम लोग टोका टोकी मत करना लेकिन तुम सब मानने वाले तो हो नहीं।दादा जी की इतनी बात सुनकर पोते ने कहा अच्छा अब नहीं बोलूँगा,चलिए आगे की कहानी सुनाइये।दादा जी ने कहना प्रारम्भ किया कि जब आग लग गयी तो अपनी जान बचाने के लिए सब जानवर भागने लगे।बाल स्वभाव पोता फिर बोल ही दिया -क्या चिड़िया आग में जल कर मर गयी ? वह भागी नहीं ? दादा को फिर कहना ही पड़ा- आखिरकार तुम माने नहीं, बोल ही दिए,देखो जैसे मीनू चुपचाप बैठकर सुन रही है वैसे तुम भी सुनो।इतना सुनने के बाद मीनू दादा के गले में हाथ डालकर बोली- दादा दादा केवल मुझको कहानी सुनाइये,इसको मत सुनाइये।उसका इतना कहना था कि भाई बहन दोनों वहीं आपस में भिड़ गए।अब दादा जी के सामने एक नयी मुसीबत आ खड़ी हुई।लेकिन यह तो रोज की बात थी।आखिरकार दोनों को समझा बुझाकर दादा जी ने कहानी आगे बढाया। हाँ तो जब जंगल में आग लग गयी, सभी जानवर भागने लगे तब चिड़िया भागी नहीं बल्कि अपने चोंच में बगल के तालाब से पानी लाकर आग पर छिड़क देती थी।
दादा जी, दादा जी चिड़िया कितनी पानी लाती थी कि जंगल की आग बुछ जाती।इस बार पोते की यह बात सुनकर दादा जी बिगड़ते हुए बोले– चुपचाप सुनने को नहीं,कहीं न कहीं कुछ टाँग जरुर अड़ा दोगे।उनके इतना कहने पर मीनू बोल उठी–दादा जी ,दादा जी इस बार ये बोलेगा तो इसे जरुर पीटिएगा।उसका इतना कहना था कि उसके भाई ने उसे एक चपत लगा ही दिया।फिर मीनू कहाँ चुप बैठने वाली थी,दोनों में गुत्थम गुत्था शुरु हो गया।चिड़िया कि जगह चुनमुन की कहानी होने लगी।तभी दादा जी ने अपने बेटे को आवाज लगायी।वे दोनों को डाँटते हुए अलग कर दिए और फिर अपनी पत्नी के पास आकर उन्हें बिगड़ने लगे–तुम देखती
नहीं हो,वे सब बाबूजी को परेशान किए हुए हैं।उत्तर में पिंकू की मम्मी ने कहा- क्या कहूँ ? आज आपकी छुट्टी है इसलिए आप देख रहे हैं।मैं तो रोज यही किस्सा देखती हूँ।रोज दादा, पोती- पोते बैठकर खाएंगे पीएंगे,कहानी-किस्से होंगें।भाई-बहनों में हथ्था पाई होगी फिर सब एक होंगें।फिर भी तुमको तो इन्हें बिगड़ना चाहिये।ज्यों हि पति महोदय ने कहा उनकी पत्नी ने बड़े प्रेम से जवाब दिया यह तो आप ही कर सकते हैं।मैं तो उन्हें बाबूजी के पास जाने से रोक नहीं सकती हूँ।ना दादा के बिना पोते पोती को चैन है ना पोते पोती के बिना दादा को चैन मिलता है।अभी देखिएगा सब एक ही जगह बैठकर गुटरु गूँ करेंगे।बात सही भी निकला,फिर सबका एक जगह बैठकर कहानी कहना सुनना प्रारम्भ हुआ।दादा जी ने कहना शुरु किया- हाँ तो चिड़िया पानी ला लाकर आग पर डालती रही,पर आग कहाँ बुझने वाली थी।उस चिड़िया की इस हरकत को देखकर दूसरी एक चिड़िया ने कहा- क्यों अपनी जान गँवा रही हो।तुम्हारे इतना करने से क्या आग बुझ जाएगी ? छोड़ो यह धंधा,जाओ कहीं मौज करो।तुम्हारे जान गँवाने से कुछ होने वाला नहीं है।उसकी यह बात सुनकर पहले वाली चिड़िया बोलने से कहाँ चुकने वाली थी।वह बोल उठी-आग भले बुझे ना बुझे।मैं भले ही इसकी आग बुझाते बुझाते मर जाऊँ लेकिन अपने फर्ज से पीछे नहीं हटूँगी क्यों कि यहीं मैं पैदा हुई हूँ और पली बढी हुई हूँ ,. मुसीबत में इसका साथ क्यों छोड़ दूँ ? जानती हो जब कभी इस जंगल का इतिहास लिखा जाएगा तो यह अवश्य लिखा जाएगा कि एक चिड़िया थी जो इस जंगल की आग बुझाते बुझाते अपने को इसमें स्वाहा कर दी।इतना कहकर दादा जी ने कहा– कहानी खतम पैसा हजम।

बच्चे तो बच्चे,वे इतना जल्दी कहाँ मानने वाले।दादा दादी के पास आकर वे और अधिक शरारती बन जाते हैं।माँ बाप के पास तो उनके मुँह में जुबान ही नहीं रहती है। वे उनसे उतना शरारत ही नहीं करते हैं।ज्योंहि दादा जी ने कहानी खतम किया मीनू टपक पड़ी. दादा जी अब पानी वाली चिड़िया की कहानी सुनाइये।उसका इतना कहना था कि उसका भाई लपक कर बोल पड़ा, अभी अभी कहानी नहीं सुनी हो क्या ? बड़ी आयी हो पानी वाली चिड़िया की कहानी सुनने, चल हट दादा को आराम करने दो।तुम सुने तो हम नहीं सुनेंगे। मीनू की यह बात सुनकर पहले तो उसका भाई खूब हँसा, जिससे मीनू चिढ गयी और उससे पुन:उलझ गयी।उन दोनों को अलग करते हुए दादा जी अपने पोते से बोले उसके कहने पर तुम क्यों हँसे ? दादा जी जब आप कहानी सुना रहे थे तो ये कान बन्द की थी क्या ? क्या यह कहानी नहीं सुन रही थी ? पोते की बात सुनकर दादा जी को भी हँसी आ गयी, जिससे मीनू चिढकर अपनी मम्मी के पास चली गयी।दादा जी उसे बुलाते रह गये लेकिन वह नहीं आयी।
अगले दिन दादा जी जब रात को घर आये तो बाजार से बच्चों के साथ बैठकर खाने का कुछ सामान लेते आये।उस समय बच्चे पढ रहे थे।दादा के आने की आहट पाते ही वे सब उनके पास दौड़ आए, फिर वही रोजमर्रा की कहानी शुरु।आज छोटी वाली अंशु भी आकर बैठ गयी।दादा पोती पोते बैठकर खाने और बातों में मशगूल हो गये, वे जानते थे कि जब तक दादा जी के पास बैठे रहेंगे,तब तक मम्मी ,पापा किसी काम के लिए नहीं बुलाएंगे और न ही पढने के लिए कहेंगे।खा पी लेने के बाद दादा ने मीनू के पानी वाली चिड़िया की कहानी कहना शुरु किया- एक चिड़िया नदी के किनारे स्थित एक झोपड़ी में घोसला बनाकर रहती थी।घोंसले में उसके दो छोटे छोटे बच्चे रहते थे।चिड़िया अपने चोंच में दाना लाती थी और बच्चों को चुगाती थी।बच्चे दाना खाकर दिन भर चूँ चूँ करते थे।एक बार नदी में बाढ आयी।बच्चे बाढ में बह गये।चिड़िया ने बच्चों को बहुत खोजा पर वे कहीं नहीं मिले।उनके बात को बीच में टोकते हुए मीनू बोल पड़ी-दादा जी जब वे सब बह गये तो फिर कहाँ से मिलते ? कहानी सुनने आयी हो या बहस करने,चुपचाप बैठकर कहानी सुनो,जब दादा जी ने कहा तो उनका पोता पिंकू बोल उठ– चल चुपचाप सुन,हल्ला मत कर।अब दादा जी ने कहानी आगे कहना शुरु किया- जब चिड़िया को उसके बच्चे नहीं मिले तो वह बहुत निराश हुई।लेकिन चुपचाप बैठी नहीं रही, भविष्य की सुरक्षा के लिए उसने नदी का पानी कम होते ही किनारे के गिली मिट्टी को चोंच में उठा लाती और झोपड़ी के पास छिड़क देती थी ,तब पिंकू बोल उठा– दादा जी मिट्टी क्यों छिड़कती थी। अरे यार तुम लोग बात पूरा करने ही नहीं दोगे ,बीच में ही टपक पड़ोगे।जाओ मैं कहानी नहीं सुनाउँगा , इतना कहकर दादा जी अपने विस्तर पर लेट गये।बच्चे कहाँ मानने वाले वे दादा जी के हाथ पैर को दबाने लगे और कहानी सुनाने की जिद्द करने लगे, तब दादा जी ने आगे कहना शुरु किया कि वह चिड़िया दिन भर चोंच में मिट्टी लाती थी और झोपड़ी के पास छिड़क देती थी।रोज रोज उसे ऐसा करते हुए देखकर एक दिन एक चिड़िया उससे बोल उठी–ये क्या तुम दिन भर चोंच में मिट्टी लेकर छिड़क रहती हो।इस पर उस चिड़िया ने कहा- नदी ने मेरे बच्चों को बहाकर मेरा घर उजाड़ दिया, बाढ से बचने के लिए मैं बाँध बना रही हूँ।दूसरी चिड़िया बोल उठी–क्या तुम्हारे इतनी सी मिट्टी इकट्ठे करने से बाँध बन जाएगा ? उत्तर में पहली चिड़िया बोल पड़ी- तो क्या प्रयास करना भी छोड़ दें ? इतनी बात कहकर दादा जी ने अपने पोती पोते से कहा- हमें भविष्य के प्रति कभी भी प्रयास और उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिये। अब कहानी खतम, चुक्का मानी।

अभी तक तो अंशु कुछ नहीं बोल थी।लेकिन दादा जी के चुक्का मानी कहने पर बोल उठी- दादा जी हमको बन्दर की कहानी सुनाइये।दादा जी ने हँसते हुए कहा कि बन्दर की कहानी क्या सुनाना है ? तुम लोग तो खुद ही बन्दर हो।बन्दरों को बन्दर की क्या कहानी सुनाऊँ। उनकी यह बात सुनकर बच्चे खूब हँसे, दादा जी भी खूब हँसे।ऐसे ही बच्चों के साथ बैठ बोलकर वे अपने दिन भर के थकान और तनाव से मुक्त हो जाते थे।दादा पोती पोते के बीच में कहानी चलती आ रही थी।लेकिन जब से घर में टी वी आ गया।दादा, पोती ,पोते सब टी वी के सामने बैठकर सीरीयल देखते हुए जो कुछ रहता था खा लेते थे।दादा जी टी वी की बात तो सुनते थे लेकिन अपने मन की बात अब किसी से कह नहीं पाते थे।जब तक वे बच्चों के संग हेल मेल कर रहते थे.उनसे बात करके उन्हें डाँट बिगड़ कर मन के तनाव को दूर कर लेते थे,तब तक वे स्वस्थ और प्रसन्न रहे ।कुछ दिनों के बाद दादा जी को हार्ट अटैक हुआ, वे इस दुनिया से कूच कर गये।उन्हीं के साथ खतम हुई किस्से कहानी। कहने सुनने की परम्परा।दादा पोते-पोती का मेल जोल।बड़ों का सम्मान,संस्कारों का आदान प्रदान और प्रारम्भ हुआ मानसिक तनाव,हार्ट अटैक,ब्रेन हैमरेज,तरह तरह के रोग-व्याधि, संयुक्त परिवार का विघटन और वृद्ध आश्रम में बूढों का जाना।

अरुण कुमार आर्य
मुगल सराय,चन्दौली।

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