#Pratiyogita Kahani 18 by Dr Prakhar Dixit

बड़े साहब
इधर इलाहाबाद जाने के लिए गोविंद बाबू के घर सामान बंध रहा था, साढे ग्यारह बजे वाली पैसेंजर गाड़ी का समय घड़ी की सुई टिक टिक करते हुए बताकर आगाह कर रही थी। गोविंद बाबू बडबडाने में गाफिल थे। इस परेशानी और आपाधापी का पूरा ठीकरा वह राजो भौजी पर फोड़ रहे थे।
इसी बीच लोई का पता पूछना राजो भौजी को गोविंद बाबू के लिए ग़ज़ब हो गया—” भुल्लन की माई कहे देते हैं …..हमरा माथा ई बेरा तमतमाय रहा है। ई सब दो दिन पहिले कर लेती तो हमें काहे आज हपड -धपड करना पड़ता।”
भौजी बिफरी –” देखो जी……अपना सामान खुद ही संभारौ..तुम्हार का ठिकाना ,……….हमें स्टेशन पर ही छोड़ के चले जाव।”
” राम करै जाह जात्रा सकुशल निपट जाय। ”
गोविंद बाबू ने तुरुप मारा—-” तुम्हार संग कुशलता।……..कोढी मरै संगाती चहाय। ”

इस वाक् वाण ने अपना पूरा नकाम किया । दोनों चुप। पैकिंग पूरी , सवारी पकड़ी और स्टेशन पर हाज़िर। जीवन पर्यंत यही नोकझोंक तो टानिक का काम कर रही है। अब न गिला और न शिकवा। राजो भौजी को बस एक हीचिंता — संगम स्नान और मंदिर दर्शन की तो वहीं गोविंद बाबू अपने अनुज सुनिकेत से मिलने के लिए व्यग्र थे। होते भी क्यों न पिताजी के निधन के बाद अनुज सुनिकेत को पुत्रवत स्नेह दिया था। मिडिल स्कूल की मास्टरी की तनख़्वाह में पहले खर्चों लम्बी फेहरिस्त थी फिर भी येन केन प्रकारेण अपना तन पेट काटकर और अपनी इच्छाओं का दमन करके अच्छी तालीम दिलायी । पढ़ाई के लिए कोई अडचन बाधा न बन सकी। सुनिकेत आज इलाहाबाद में राजस्व विभाग का बड़ा अधिकारी बन गया था।
राजो भौजी देवरानी सुलोचना और बच्चो के लिए गन्ना ,सत्तू, भूजा ,मकई का भुंटा और हाँ खेत की शकरकंदी अपने साथ बांध ली थी।
स्टेशन पर गाड़ी आयी ।दोनों लोग अपनी अपनी सीट पर जम गये। गाड़ी अपने गन्तव्य की ओर सरपट दौड़ पड़ी। रात के अंधेरे ने नींद को अपने आगोश में ले लिया।
पौ फटी ।सूर्यदेव पूरब में चमकने लगे। डिब्बे की चहलकदमी और शोरशराबे से पता लगा कि इलाहाबाद आ रहा है। गोविंद बाबू ने समान सरियाया भौजी को ताकीद दी — संभल कर उतरिए । कुली किया। स्टेशन से बाहर आए तो एक कार के पास खड़े युवक के हाथ में गोविंद सिंह बहराइच की तख्ती को लिखा देखा। उस युवक को अपने पास बुलाया । बोले -” हमहिं हैं भइया गोविंद सिंह। सुनिकेत बबुआ ने भेजा है। ”
” सुनिकेत साहब ने भेजा है। बैठिए” ड्राइवर बोला।
“ऐ लल्ला तुम्हार नाम का है औउर कौन जिला हौऊ…..?? का अपने साहब के डिराईभर हो।” भौजी का वात्सल्य हिलोर मारने लगा।
जी …….ड्राइवर ने हामी में सिर हिलाया।
झिकझिकाके भौजी बोली—” टका भरे की ज़बान नाहीं हिलत औउर पसेरी भरे का मूढ हिला दीये हो।”
ड्राइवर मंद मंद मुस्कराया बोला-” अम्माँ…. हमारा नाम बनवारी लाल है और नखलऊ जिला है।”
” लला बहुतै नीक लगा। ईसुर तुमैहि औउर परिवार का सुखी राखै।” भौजी ने ढेरों दुआओं का आशीर्वाद दे दिया।
कार शहर के सड़कों चौराहों से गुजरते हुए भव्य इमारतों के दर्शन कराती अपनी स्पीड से सरपट दौड़ रही थी। जाम, गंदगी ,शोर आधुनिकता और फैशनपरस्ती को देखकर गोविंद बाबू को लगा अपना गाँव आज भी बहुत अच्छा है। गाँव की ताजगी, स्नेह ,जाम से निजात और सादगी शहर पर भारी लगे।
खैर अंततोगत्वा भारी भरकम बंगलानुमा इमारत के सामने कार रुकी। गेट पर खड़े दरबान ने बाबू जी और भौजी को प्रणाम किया। सभी लोग अंदर दाख़िल हुए। अर्दली ने कार से सामान निकालकर अंदर पहुँचाया।
गाँव से भौजी का लाया उपहार देख सुनिकेत और उसकी पत्नी सुलोचना के तेवर चढ़ गये। “भइया यह सब क्यों उठा लाए हो। इससे तो मेरा स्टेटस् मिट्ठी में ही मिल जायेगा। क्या हम अब गन्ना, गुड ,सत्तू खायेंगे। ………….(सुलोचना ने बीच में बात काटी)।हमारे बच्चे इसे हाथ भी नहीं लगायेंगे।
खानपान के दौरान सुनिकेत ने पूरा सामान अर्दली को दे दिया। यह दृश्य बाबू जी और भौजी से देखा न गया। गोविंद बाबू का एहरा क्रोधाग्नि से तमतमा रहा था। राजो भौजी भी सन्न थी।
दोनों लोगों ने मिलकर तुरंत धर्मशाला में रुकने का फ़ैसला किया। जब यह खबर सुनिकेत और सुलोचना ने सुनी तो उनके पाँव तले ज़मीन खिसकते जान पड़ी। दोनों पैर पकड़कर क्षमा मांगने लगे,लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। पानी सिर से ऊपर जा चुका था। गोविंद बाबू ने सामान समेटा लम्हों में गेट पर राजो भौजी चुपचाप पीछे खड़ी थी। रिक्शा को हांक लगायी। मारवाडी धर्मशाला ……..दो सवारी।
कौन मोहाल बाबू साहेब
अरे भइया पल्टन बाजार के लगै है वो बही नगर पालिका वाली पानी की टंकी कै तीर।
हाँ हाँ बैठौ समुझ गयन बाबू साहेब।
गोविंद बाबू और भौजी के आंखों आंसूँ छलक आए। सुनिकेत बहुत प्रयास किआ किंतु सभी विफल।गोविंद बाबू बोले –” बेटा…… जो शख्स अपनी जडो से कट जाता है तो वह पंख विहीन पक्षी की तरह होता है। संस्कार हमारी थाती हैं और जीवनचर्या व खानपान संस्कृति। यह हमें सबल बनाते हैं। हम चाहे कितने ही ऊपर उठ जाए लेकिन याद रहे अपनी औकात थाह पता रहे। तुम बड़े साहब बेशक बन गये लेकिन तुम्हारे पाँव ज़मीन पर नहीं रहें ।तुम कुशल से रहो। ख़ुश रहो। मैं धर्मशाला में रुकूंगा। मेरे पास अनुज बनकर आना तुम्हें सब कुछ वैसा ही मिलेगा।
…………………और हाँ गाँव की देहरी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।
आशीर्वाद ख़ुश रहो कहते कहते अश्रुधार अविरल बह चली।उधर रिक्शा अपनी मंज़िल की ओर चल पडा।
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डॉ प्रखर
फर्रुखाबाद

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