#Pratiyogita Kavita by Ajeet Singh Avdan

धर्म-विमुख ( आज के रावण )
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धर्म-आचरण सद-प्रकाश है,ढोंग गहे अँधियारे को,
ज्ञान एक आधार पुञ्ज है,परखे तम-उजियारे को ।।
छद्म-वेश पाखण्ड मिलें जब,भ्रमित वहीं अज्ञान हुआ ।
धर्म ! चरम-परमार्थ हेतु है,ढोंग-स्वार्थी काँध-जुआ ।।

भाँति-भाँति उल्लास पर्व जो,हम प्रति-वर्ष मनाते हैं ।
अर्थ निहित जो इनमें उनका,भान कहाँ तक पाते हैं ।।
आता है प्रति-वर्ष दशहरा,साथ दिवाली आती है ।
जीत बुराई पर सच की हो,संदेशा दे जाती है ।।

जहाँ ज्ञान का सागर रावण, अहंकार में जलता है ।
वहीं प्रतीकों की मण्डी में,मन ही मन में पलता है ।।
जहाँ सत्य के लिए अहिंसा, कायरता बन जाती है ।
वहीं झूठ से साँठ-गाँठ कर, हिंसा सच की घाती है ।।

जहाँ साँझ ढ़लते असंख्य,दीपावलियाँ जगमग होतीं ।
वहीं तले दीपक के तम में, कुछ कलियाँ घुटकर रोतीं ।।
जहाँ चरण छूने भर से ही,शिला अहिल्या बन जाती ।
वहीं नारि पत्थर सी होकर,जीवन भर है दुख पाती ।।

जहाँ बेटियों के सावित्री,सीता नाम रखें परिजन ।
वहीं कलंक शब्द चर्चित हो, सज्जन हैं हम या दुर्जन ?
जहाँ नारियाँ जौहर व्रत में,भष्म हुईं हों गाथा है ।
वहीं आज मर्यादा सीमा,पार झुक रहा माथा है ।।

जहाँ पिता वचनों में बँधकर,सुत विछोह में तन त्यागे ।
वहीं मुकर जाना वादों से,आज हुआ प्रचलन आगे ।।
जहाँ कभी माता की इच्छा,के अनुपालन उच्च रहे ।
वहीं कल्पना से ही दुख की,निज गौरव को तुच्छ कहें ।।

जहाँ बन्धु का प्रेम बड़ा था,पत्नी का अधिकार नहीं ।
वहीं विवाहित खो देता है,अग्रज के प्रति प्यार कहीं ।।
जहाँ बड़े भाई आदर्शों,के प्रतीक बनते आए ।
वहीं अनुज अब लोभ तले नित,कितने ही छलते पाए ।।

जहाँ मित्रता हुई निछावर,मुट्ठी भर कन्दुल पाकर ।
वहीं दोस्ती के आँडे में,घात करें घर में घुसकर ।।
जहाँ कभी सामर्थ्यवान,थे भाग्य-विधाता दुखियों के ।
वहीं दीन रौंदे जाएँ अब,पाँवों पूँजी-पतियों के ।।

जहाँ मातृ भू की रक्षा में,प्राणों की परवाह नहीं ।
वहीं दोगले जयचन्दों के,ओंठों पर इक आह नहीं ।।
जहाँ बालपन के खेलों में,मुखिया नाग-नथइया हैं ।
वहीं राज-नेताओं के कद,सूचक सूकर-गइया हैं ।।

जहाँ कभी सेना समक्ष हो,धर्म-युद्ध करतीं डट कर ।
वहीं आज मासूम प्रजा पर,चलें गोलियाँ लुक-छिप कर ।।
जहाँ साँझ के शंखनाद पर,युद्ध बन्द होते आए ।
वहीं सर्जिकल स्ट्राइक की,नौबत वाली राताए ।।

धर्म-सनानत में व्यापे इस,आडम्बर को पहचानो ।
हे ! जीवों में सर्व-श्रेष्ठ अब,तो खुद को मानव मानो ।।
यहाँ आस्था-भक्ति ! शक्ति हैं,यदि विवेक के साथ रहें ।
बुद्धिमता-मतिपूर्ण कसौटी,युक्त सिद्धियाँ हाथ गहें ।।

स्तर पर अपने भी जाँचें,बातों को दुनिया भर की ।
जो पसन्द ही नहीं स्वयं को,होगीं वो किस स्तर की ।।
पैमाना ‘अवदान’ सहज है,सुलभ हुआ है जो सबको ।
जब तक मुँह फेरेगें इससे,तब तक भूले हैं “रब” को ।

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