#Pratiyogita Kavita by Arun Kumar Arya

रावण की जय हो
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राम जहाँ के तहाँ जस के तस
रावण वर्ष, प्रतिवर्ष बढ़ता रहा
सिकुड़ती रही राम की मर्यादाएं
सीना रावण का उभड़ता रहा।

रह गये अब राम ओठों तक
रावण नित सीने में समा रहा
हड़पने को भाई की सम्पत्ति
भाई भाई का गला घोंट रहा।

है कहाँ अब भरत सा भाई
खड़ाऊँ हो गया अन्तर्ध्यान
आज्ञा पालने में दशरथ की
हो रहा लोगों का मुख म्लान।

कथा सुनते प्रेम से राम की
खाए वे सबरी का जूठा बेर
लगाने में अछूतों को गले
क्यों कर रहे राम प्रिय देर।

अखण्ड भारत को खण्डित किया
ले शास्त्रों का दुधारी तलवार
अधिकार वञ्चित किया शूद्रों की
वनवासी प्रति है कहाँ राम सा प्यार

रावण के हैं दस शीश सदा से
हैं प्रतिनिधि ये दस दिशाओं के
अकेला क्या करे राम का शीश
चतुर्दिक राज्य रावणी आकाओं के।

हर ली जा रही वैदेही राम की
आश्रम में लव कुश पैदा होंगें
करने को अपना अन्त अब
सरयू नदी अवधेश उतरेंगें।

तीर धनुषधारी प्रभु राम
नहीं दिखेंगे अब रण में
देखने को विशाल रावण
उत्कण्ठा होगी जन जन में।

कहने को रहेगा वाक्य एक
है असत्य पर सत्य की विजय
“आर्य” सत्य तो पिट रहा दर दर
दशों दिशाओं में है रावण की जय।

अरुण कुमार “आर्य”
W/179 वेस्टर्न बाजार मुग़ल सराय,चन्दौली
उत्तर प्रदेश।
मो0नं0– 09336059610

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