Pratiyogita Kavita by Bablu Kumar Rahi

‘स्वप्न घर’ –

हो ऐसा कोई स्वप्न-घर
न मेघ न कोई तम-चर
जहाँ बहता संगीतमय मृदुजल
शांतमय भुवन हिम-शीतल। 1

सुदूर क्षितिज पर हो नव-नूर
जीवन उमड़ता हो बन अंकुर
पवन-पराग छाई हों चहुंओर
जैसे नाच उठे हो कोई मोर। 2

जहाँ भाव-तरंग बहता कोमल
एक-ताल एक-सम अनमोल
बहुरंग में लगाता गोता
काश! आज भारत ऐसा होता। 3

देश-तटनी में बहता हो इमान
फिर देश क्यों न चढे आसमान
न कोई चोरी न कोई बेईमान
जहाँ देशवासी को हो अभिमान। 4

राज्य नहीं देश हेतु मरे कोई
अपने-अपनों का लहू बहाए न कोई
रक्तों से सना न हो हमारा देश
केवल रामराज्य का हो हमारा भेष। 5

एक वक्त पारस शील थें हम
एक स्पर्श से रोग-शोक मिटते गम
आज लौह बन भटक रहा इन्डिया
कनक बना दें ढूँढ़ रहे कोई बिन्दियाँ। 6

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