Pratiyogita Kavita By Akash Khangar

सावन(वर्षा ऋतु)

बूंदे महज़ पानी नही

ये प्रेम की कहानी है

बेजुबान धरा पर

गरजता आकाश तूफानी है

बूंदे महज़….

यू अहसास होता है अम्बर फूट-फूट रोता है

शायद इंतज़ार का सबब अमावस सा होता है

प्रकृति के भी अनूठे रूप है

प्यास बुझती नही धरती की

और चातक 8माह सपने संजोता है

फिर भी सबके लिए सुबह सुहानी है

बूंदे महज़….

लिवाज ओढ़े मिट्टी हरा भरा

मुस्काये पर्वत, झरने और घटा

तरह तरह के कीट,जीव हुए जाग्रत

मदमस्त हुई नम हवा, सयानी है

अन्न,जल,जीवन की प्रस्तावना लिखती

मौसम की पहली बूंदे

इनकी खनक बड़ी मस्तानी है

बूंदे महज़…

कही बारिश की छम छम

कही बाढ़, गाज,आंधी की नादानी है

कही मुस्कान फूटी लबो पर

कही नमकीन पानी है

यज्ञ,जप,तप करते नर-नारी

कही पड़े है सूखा

कही बारिश दीवानी है

खेल अनूठा प्रकृति का

कही दूर आवाज हुई

और बरसा यहाँ पानी है

बूंदे महज़ पानी नही

ये प्रेम की कहानी है…

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