#Pratiyogita Kavita by Alok Shrivas

जलते सावन के टुकड़ों में,
दर्द  भीग  जब  जाती  है ।
बून्द- बून्द करके आँखों से,
बन के घटा  गिर जाती है ।।

दिल की तड़प पपीहे सी ,
जब पीहू- पीहू चिल्लाती है।
चित्कार मिलन की उनसे ,
घन – गर्जन में दब जाती है।।

सूरत भी अब बनेगी कैसे,
मेघों  के  परिवर्तन  से ।
दिख जाती है कभी – कभी,
तड़ितों के करुणा-क्रंदन से।।

स्पर्श फुहारों का चेहरे पर ,
उनका  एहसास कराती है।
नम सुरभित इन हवाओं से,
मदहोश ये मन हो जाती है।।

खुश हैं वृक्ष ये पुष्प, लताएँ,
मिल गया हो जो जीवनदान।
मैं  भी  जी  जाऊँ  गर  तुम,
प्रेम का अर्पण कर दो प्राण ।।

इतनी  वर्षा  होने  पर भी,
तृषित ये मन रह जाती है।
मैं चातक तो नहीं हूँ पगली,
इतना  क्यों  तरसाती  है।।

सावन बरसो जरा संभल कर,
यादों  को  न  बिखराओ ।
कहीं  ऐसा  न  हो  जाए  कि,
मैं  जाऊँ  तुम  आ जाओ।।

सौंधी सी खुशबू मिट्टी की,
जो उनकी याद  दिलाती है ।
मत आना ऐ  ” सावन ”  तू,
तू आकर  बहुत  रुलाती  है।।

नाम –  आलोक श्रीवास
पता –  सारंगढ़
जिला- रायगढ़
छत्तीसगढ़
मोबाइल न० – 07389562737

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