#Pratiyogita Kavita by Annang Pal Singh

बादलों की छुअन सा , अहसास साँसों में बसाये !
गगन में फिर वही चिर परिचित लुभावन जलद छाये !!

आज खेतों का पुलक तन, बादलों की छाँव में है !
बादलों की साँवली छाया हमारे गाँव. में है !!
अब हमारे मन अपावन में, नये स्वर निकल आये !
गगन में फिर……………………………………!!

वक्छ स्थल बादलों का चीरकर बिजली पुकारे !
कौनसे आकाश चुम्बी शिखर को रह रह निहारे !!
गरजते, मदमस्त से,किस ओर से ये निकल आये !
गगन में फिर …………………………………..!!

कहाँ बरसेंगे मचलकर मेघ दल जीवन. सहारे !
कौन जाने दूर कितनी, जा रहे ये मेघ. सारे !!
इस अतुल वैभव तले, क्या छिपा है?क्या निकल आये !
गगन में फिर …………………………………………!!

तोड़कर जंजीर सब, मन मोर जागा जा रहा है !
छोड़कर पाथेय सब,उस ओर भागा जा रहा है !!
दिग्दिगंत सुदूर कुंजों में, सुहावन जलद छाये !
गगन में फिर ………………………………..!!

कौनसे जीवन मरण का भेद इनमें समाया है !
कौनसे पृिय स्मरण का,साज इसने बजाया है !!
किस पृयोजन से कहाँ से, बादलों के झुण्ड आये !
गगन में फिर …………………………………..!!

कौनसी भवितव्यता,निःशब्द दुख कीआह में है !
इस निविड़तम अँधेरे में,कौन किसकी चाह में है !!
कौन जाने? मेघ दल, किस मंतृणा में क्या छिपाये !
गगन में फिर वही चिर परिचित लुभावन जलद छाये !!

अनंग पाल सिंह ंअनंग ं
बी.एच. ३७, डी. डी. नगर ग्वालियर ंम. पृ. ं
मो़बा. ९४२५७ ०१४१०.फोन.०७५१_२४७२७३६.

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